रविवार, 23 नवंबर 2014

समीक्षा करो या समाप्त करो

केंद्र सरकार को चाहिए कि एक उच्च स्तरीय संवैधानिक आयोग का गठन करके अनुसूचित जाति/जनजाति आरक्षण की समीक्षा करे और SC/ST आयोग को इस प्रक्रिया से दूर रखे। समीक्षा में पर्याप्त विकसित और भागेदारी पाई जातियों को बाहर कर अन्य नई प्रस्तावित जातियों को इसमें शामिल किया जाना चाहिए।
64 वर्षो से जो जातियां SC कोटे में इंजॉय कर रही हैं उनकी तुलनात्मक स्थितियां भी सबके सामने आनी चाहिए। जबकि इस दिशा में न्यायालय से लेकर RTI तक के जवाब देने की स्थिति में सरकार नहीं है। वर्तमान प्रक्रिया में आरक्षण का मूलभूत उद्देश्य हाइजैक कर लिया गया है और यह व्यवस्था में वंचितों की भागेदारी सुनिश्चित की बजाय वोटबैंक और उसके जरिये आरक्षित समूहों में वर्चस्व कायम करने का हथियार बनता जा रहा है।
आरक्षण दुनिया के हर देश में किसी न किसी रूप में लागू है यहाँ तक कि विकसित कहे जाने वालों देशों में यह प्रणाली सशक्त रूप में लागू है। किन्तु 64 वर्षों के पश्चात् भी भारत में दलितों और पिछड़ों के विकास के नाम पर आरक्षण का उनके बड़ी जातियों ने इसका अपने हिसाब से दुरूपयोग किया है और अन्य किसी भी जाति को 64 वर्षों में उबरने ,पनपने या अपने समक्ष टिकने नहीं दिया है।
उत्तर प्रदेश बिहार के सन्दर्भ तथ्यात्मक विश्लेषण करें तो आंकड़े अपनी कहानी खुद कहते हैं। व्यवस्था भागेदारी का दम तो भरती है लेकिन अनेकों जातियों के लिए शासन प्रशासन में भागेदारी अब भी स्वप्न सरीखी है। SC सूची खटिक नट भांतु बेड़िया बधिक चिड़ीमार मझवार तुरैहा गोंड बेलदार धोबी मजहबी खरबार हरी ग्वाल बंगाली आदि जातियों का प्रतिनिधित्व शून्य प्रायः है जो प्रमाणित करता है कि व्यवस्था में कहीं न कही दोष है। इसी प्रकार पिछड़े वर्ग की 40% जातियां तमाशबीन बनी हुयी अपनी नियति पर रो रही है। आरक्षण प्रणाली से उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ, उल्टा उनकी स्थिति बदतर हुयी है।
मजेदार तथ्य यह है कि आरक्षण व्यवस्था जब हर दस वर्ष के लिए आगे खिसकाई जाती है तो इन्ही नट नगाडची ढोली डफाली कंजड केवट कहार मुड़ीयारी मिरासी बैजनिया गोंड पाटरी पनिका धीमर भान्तु सांसी सहरिया चिक चिकवा भूइयारों और भंगियों का सर्वे होता है और इन जातियों की दुर्दशा का रोना रोकर संविधान समीक्षा के नाम पर संशोधन करा लिए जाते है और फिर आरक्षण के नाम पर रोटी तोडती आई चंद ठेकेदार जातियों के संगठित समूह पुनः दस वर्षों के लिए आश्वश्त हो रूलिंग कास्ट ऑफ़ इण्डिया बन जाते हैं।
वास्तव में 64 वर्षों से लाभान्वित जातियों की ठेकेदारी पूर्ण मानसिकता और सरकारों की उनके वोटबैंक के सम्मुख दंडवत की मानसिकता व्यवस्था में भागेदारी से वंचित और बहिष्कृत तबके में आक्रोश पैदा कर रही है। नतीजतन आरक्षित दायरे में आने वाली वंचित जातियों को आरक्षण प्रणाली में दोष नज़र आने लगा है और वे वर्तमान आरक्षण प्रणाली की समीक्षा की मांग सार्वजनिक रूप से उठाने लगीं है।
सभी वंचितों में आरक्षण समान रूप में सुनिश्चित हो वर्ना यह विभेदकारी व्यवस्था समाप्त हो। आरक्षण में भाई भतीजावाद और जातीय दबदबा इसकी मूलभूत धारणा के विपरीत है।

शनिवार, 6 सितंबर 2014

सामाजिक पुनर्पहचान : आवश्यकता ,साजिश या झेंप

निरे कुतर्कों को बौध्दिकता का जामा पहना कर महज अपने अहम के लिए करोड़ों गरीब मछुआरों के जीवन संघर्ष को सिर्फ रोटी की जिद्दोजहद समझने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी समाज के समक्ष सवाल के तो खड़े कर सकते हैं किन्तु जवाब के नाम पर मोर्चा छोड़कर भागने वाले जब समाज के अधिकारों मानसम्मान और भागेदारी की लड़ाई को यह कर नया रुख देना चाहते हैं कि पहले राष्ट्रीय पहचान तय कर लो.…… तो हंसी आती है । 
जिस समाज का इतिहास आर्य जातियों से भी पुराना हो , जिस समाज का इतिहास आर्यो के भगवानों से भी पूर्ववर्ती हो उसे पहचान के संकट में फँसाना उसके संघर्षों को कमजोर करने जैसा है । क्या हम पहचान के मोहताज है ? क्या विश्व में हमारी पहचान किसी से छिपी हैं ? हमारी सभ्यता और संस्कृति किसी टाइटिल या जातीय नाम की मोहताज है ? भगवान कहे जाने अवतारों की मदद करने वाला समाज क्या अपनी शिनाख्त के लिए आज अपना नया नाम रखेगा ?
जो लोग मछुआ समुदाय और निषाद संस्कृति को टाइटिलीय झगड़ों में पचड़े में डालकर हमारी पुरातन और प्रागैतिहासिक कालीन पहचान को नए शब्दाडंबरों में पिरोकर अपनी झेंप मिटाना चाहते हैं दरअसल वे बुद्धिजीविता के नाम पर बौद्धिक आतंक का सहारा लेकर मछुआ समुदाय के आरक्षण की लड़ाई को संवैधानिक रूप से कमजोर करना चाहते हैं और आरक्षण विरोधी चरित्र के पोषक हैं पक्षधर हैं और पहरेदार हैं । 
मछुआ समाज को कश्यप निषाद में , फिर कश्यप को धीमर कहार और कश्यप में , कश्यप को कश्यप राजपूत और झिम्मर में , फिर कश्यप राजपूत को राजपूत और डोगरा में बाँटने वाले लोग अपने महासुदृढ़ आर्थिक स्तर की तुलना उप्र मप्र और बिहार के गरीब केवट धीमर से क्यों करते हैं जिसकी जाति को अंग्रेजों ने चोर डकैत कहकर सामाजिक रूप से बहिष्कृत किया । उनसे आपकी समानता समक्षता और समभाव कैसे हो सकता है ? निषाद को काला कलूटा और जंगली कहकर आप कैसे सामाजिक एकता ला सकते हो ?
आप राजपूत कहकर अपनी झेंप मिटा सकते हो लेकिन जिस मेहनतकश समाज को राजपूतों ने उजाड़ा लूटा और ठगा हो , शहर गाँव और बस्तियों से दूर बसने पर मजबूर किया गया हो वो राजपूत कैसे हो सकता है ? 
हो सकता है पंजाब हरियाणा राजस्थान जैसे विकसित राज्यों के निवासी समाज बंधू सवर्णों और अर्थप्रधान सामाजिकता के कारण अपनी पहचान को नए आयामों में गढ़ कर अपने लिए नयी जमींन तैयार करते हैं लेकिन साथ ही वे करोड़ों वंचित शोषित वहिष्कृत उजड़े पिछड़े दबे कुचले मछुआरों द्वारा संघर्ष पूर्वक अपने संविधान सम्मत अधिकारों की तैयार जमीन को छीनने का काम भी करते है । 
मछुआ समुदाय के संघर्ष की निर्णायक बेला पर पहचान का संकट खड़ा करना अपने आस्तित्व को नकारने जैसा है ।अपने वर्षों के आंदोलन को अपने हाथों नष्ट करने जैसा है । आवश्यकता अपनी पहचान को ताल ठोक कर और मजबूत करने की है न कि पहचान को नकारने की……जैसा कि कुछ बुद्धिजीवी मित्र अभियान छेड़े हुए हैं ।

मंगलवार, 27 मई 2014

मत भूलो .........!

मोदी मंत्रिमंडल से वंचित रखे गए मछुआ समाज के लोगों,
मत भूलो .........!
मत भूलो कि तुम इसे देश की मूलसंस्कृति का प्राणतत्व हो
मत भूलो कि तुम भारत भूमि के प्रथम अधिकारी हो
मत भूलो कि तुम्हारा अस्तित्व आर्यों के भगवानों से भी पूर्ववर्ती है
मत भूलो कि अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए राम भी तुम्हारे द्वार आये थे
मत भूलो कि तुम्हारी मत्स्यगंधाओं को ऋषियों की वासनाओं ने रौंदा है
मत भूलो कि तुम्हारा स्वर्णिम अतीत आर्यों को अबतक मुंह चिढाता है
मत भूलो कि
तुम्हे अंगुष्ठविहीन करके भी कोई परास्त न कर पाया
मत भूलो कि तुमने एकलव्य का बदला श्रीकृष्ण की हत्या से लिया था
मत भूलो कि तुमने स्वाभिमान के लिए जंगलों में रहना स्वीकार किया
मत भूलो कि तुमने बहन बेटियों का सौदा मुसलमानों से नहीं किया
मत भूलो कि
तुमने आजादी की लड़ाई पहले मोर्चे पर लड़ी
मत भूलो कि
तुम्हे अंग्रेजों और सवर्णों ने अपराधी जाति ठहराया
मत भूलो कि
तुम 1931 में वंचित घोषित होने के बाद भी वंचित हो
मत भूलो कि तुम 1947 में भी आज़ाद नहीं हुए
मत भूलो कि
तुम आज़ाद भारत में 5 वर्ष 16 दिन हिन्दुओं के गुलाम रहे
मत भूलो कि
तुम्हें संविधान में घोषित अधिकार आज भी नहीं मिले
मत भूलो कि तुम्हे
पहले SC फिर ST फिर विमुक्त और अंत में पिछड़ा घोषित कर तुम्हारे संवैधानिक अधिकारों को भ्रम फैलाकर रोका गया।
मत भूलो कि तुम्हे सैकड़ों उपजातियों में बांटकर अल्पसंख्यक बनाया गया।
मत भूलो कि तुम बहुसंख्यक हो और अपने वोट की ताक़त पर देश में अव्वल हो
मत भूलो कि तुम दूसरों को अपना भाग्य विधाता मान सत्ता सौपते रहे
मत भूलो कि
तुम्हारा संगठित होना आज भी आर्यों को खलता है
मत भूलो कि तुममे भी नेतृत्व क्षमता है
मत भूलो कि तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन तुम्हारा बिखराव है
मत भूलो कि
तुम लोकतंत्र में राजनैतिक सोच के बिना कुछ भी नहीं
मत भूलो कि तुम्हारी पीढियां पिछड़ेपन हेतु तुम्हे ही दोषी ठहराएंगी
मत भूलो कि
तुम्हारी नन्हीं सी कोशिश एकता का मजबूत आधार हो सकती है
मत भूलो कि तुम अपने वोट की शक्ति से देश के शासक बन सकते हो।

मत भूलो .........!

शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

कहारस्थान : एक सार्थक मांग ,जिसे गणतंत्र के नाम पर वापस लिया

आजादी के आखरी दशक में देशभर में राजनैतिक और सामाजिक गतिविधियाँ काफी तेजी से प्रारम्भ हो गई थीं। 100 वर्षों की स्वतंत्रता संग्राम के चलते अंग्रेजों के देश छोड़कर जाने के आसार दिखने लगे थे। और ये निर्धारित हो गया था कि अब अंग्रेजी राजसत्ता ज्यादा दिनों चलने वाली नहीं हैं । एक जहाँ सिखस्थान (बाद में खालिसतान ) की मांग पंजाब में मास्टर तारासिंह उठा रहे थें। आदिवासी बहुल क्षेत्रों में भी उत्तर पूर्व में डा0 जेड.ए. किंजों नागालेंड की मांग कर रहे थे। मिजोरम में लालडेगा, झारखंड, में बिहार, छोटा नागपुर, मध्यभारत, महा कौशल में डा0 जयपाल सिंह पृथक झारखंड गणतंत्र की मांग लेकर चल पड़े थे। देश का पिछड़ा आदिवासी निषाद (भोई) समुदाय भी आन्दोलित हो रहा था, तब भोपाल स्टेट के डा0 इन्द्रजीत सिंह ने आल इंडिया कहार महासभा का गठन किया और इसकी जनरल मिटिंग में पारित प्रस्ताव, जिसके माध्यम से पृथक कहारस्थान की मांग तात्कालिक लार्ड पेथिक लारेन्स (ब्रिटिश केबिनेट मिशन लंदन) वायसराय दिल्ली को एक ज्ञापन आल इंडिया कहार महासभा द्वारा दिनांक 20/04/1946 को दिया गया।
                  सिख धर्म के उत्थान में कहार समाज का महत्वपूर्ण योगदान रहा था। इस कारण पंजाब के सामाजिक नेताओंने कहारस्थान पर भारी जोर दिया। जिस समय कांग्रेस आंदोलनों के फलस्वरूप साइमन कमीशन भारत आया था, उस समय हमारे नेताओं जिनमें डा0 इन्द्रजीत सिंह के साथ श्री महावीर प्रसाद , श्री दुर्गादत्तसिंह कुशन बिजनौर,रायबहादुर ऑफ नवाब रामपुर सर चौधरी नत्थू सिंह तुराहा, श्री गुलजारी मलजी बाथम पीलीभीत आदि बुद्विजीवी समाज के नेता थें, उन्होंने देश की स्वतंत्रता के समय कहारस्थान की मांग की थी। इस कारण देश के दूसरे प्रातों में भी कुछ इस प्रकार की मांगें उठी थी। छूत एवं अछूत का प्रश्न भी गर्माहट के साथ उठा था। यह प्रश्न बाबासाहेब अबेँडकर जी ने उठाया था। जिस समय समाज का प्रबुद्ध वर्ग जाति का नाम बताने में लज्जा अनुभव करता था, उस समय डा0 इन्द्रजीत सिंह जी ने सार्वजनिक मञ्च से कहार महासभा का झंडा उठाया था, जिसमें निषाद महासभा का यथा संभव सहयोग मिला था। इसी समय लगभग सन 30-31 में होंशंगाबाद में बाबू गुलाबसिंह बाबने जी की अध्यक्षता में कहार सम्मेलन का वृहद् आयोजन किया गया था, जिसमें भोपाल सहित देश के विभिन्न प्रान्तों से आए नवयुवकों ने स्वयंसेवक के रूप में भाग लिया था, डा0 सहाब समाज को संगठित करने, उनकी समस्याओं को अखिल भारतीय स्तर पर ब्रिटिश तथा स्थानीय शासन के सामने नियमित रूप से रखते रहे। राजनीति के मञ्च पर विशेष रूचि के साथ उन्होंने सन 1945 के पश्चात भाग लिया।
भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई के समय ही हमारे नेताओं को अनुमान हो गया था कि स्वतंत्रता के पश्चात हमारे समाज के साथ न्याय नहीं किया जावेगा और हमारा समाज अंग्रेजों के चंगुल से छूटकर हिन्दू सवर्णों की गुलामी कि ओर अग्रसर हो जायेगा । इसीकारण कहारस्थान की मांग की गई थी, मास्टर तारासिंह जी ने भी खालिस्तान मांगा था। सन् 1946 में देश की अन्तरिम सरकार बनी थी तब लाहौर से प्रकाशित डान अखबार ने एक कार्टून छापा था, नीचे लिखा था, पंडित नेहरू वरूण देव यानि जलदेव के दरबार में अर्थात अन्तरिम सरकार में हमारे समाज का प्रतिनिधि लेने की बात चल रही थी। कांग्रेस के द्वारा आश्वासन देने पर समाज ने भारत स्वतंत्रता के पक्ष में कहारस्थान की मांग वापस ले ली थी।
              इस समय समाज को गोत्रों के आधार पर संगठित करने के प्रयास त्याग दिया था, क्योंकि भारत में भिन्न भिन्न प्रदेशों में अनेंकों गोत्र, उपजातियां हैं, इसी समय समाज का पत्र कर्णधार का प्रकाशन भोपाल से किया, कुछ समय पश्चात् उसका प्रकाशन एक प्रकाशन मंडल बनाकर झांसी से प्रकाशित किया गया, जिसके मुख्य प्रकाशक श्रीसुन्दरलाल जी रायकवार थे। निषाद समुदाय की राजनीतिक गतिविधयों का प्रमुख केन्द्र भोपाल रहा, ओर राजनैतिक चेतना का केन्द्र बिन्दु अखिल भारतीय निषाद समाज का " कर्णधार " नामक अखबार
रहा है।

शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

चलो निषादों ! दिल्ली पहुँचों..........


बहुत हो चुकी अब अनदेखी, आर करो या पार करो।
दिल्ली चलकर करो धमाका, सत्ता पर प्रहार करो ।।

चलो निषादों ! दिल्ली पहुँचों, संसद पर अधिकार करो ।
एक महाभारत दिल्ली में निश्चित अबकी बार करो ।।

 रक्त पिपासू देहली वाली सड़कों ने आह्वान किया ।
अब निषाद दें रक्त, यहाँ वीरों ने निज बलिदान दिया ।

स्वतंत्रता संघर्ष प्रमाण है, जो सड़कों पर आया है ।
जिस समाज ने रक्त दिया ,संघर्ष किया, कुछ पाया है ।

उठ निषाद ! अधिकार समर की सेनाएँ तैयार करो ।
चलो निषादों ! दिल्ली पहुँचों, संसद पर अधिकार करो ।।

जिस दिन तेरा लहू सड़क पर दिल्ली की बह जायेगा ।
उस दिन सूरज अधिकारों की कथा स्वयं कह जायेगा ।

आरक्षण अधिकार हमारा ,और नहीं टल पायेगा ।
अगर ठान लो तो संसद का, सत्र नहीं चल पायेगा |

दिल्ली की सड़कों पर आकर, तुम सत्ता पर वार करो ।
चलो निषादों ! दिल्ली पहुँचों, संसद पर अधिकार करो ।।

साठ बरस से वंचित मछुआ, अब अंगडाई लेता है
अपने हक़ के लिए चुनौती,  कांग्रेस को देता है।

उलटी गिनती शुरू हो गयी, कांग्रेस के जाने की ।
राहुल कितनी कोशिश करलो, अबके नाम बचाने की।

मनमोहन मछुआ को हक दो या जाना स्वीकार करो।।
चलो निषादों ! दिल्ली पहुँचों, संसद पर अधिकार करो ।।

कापी राईट @ अरुण कुमार तुरैहा
█║▌│█│║▌║││█║▌│║█


शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

पीढियां विश्वास में..............

आपने हँसकर के टाला है, जिसे उपहास में।
उसको स्वर्णिम सभ्यता, लिखा गया इतिहास में।

आज भी मुद्दा मेरा, एक प्रश्न बनकर है खड़ा
और जवाँ होती रहीं बस, पीढियां विश्वास में।

पूछता है वो, कि जल्दी से कहो चाहते हो क्या ?
कैसे सदियों की व्यथा, कह दूंगा मैं एक श्वास में ?

नर्म रोटी की महक ,दिन भर थकाती है जिसे।
पुण्य लेकर क्या करे, वो एक दिन उपवास में।

मेरे मुद्दे मौन से, थामे सड़क.……पसरे रहे ।
और सदन बस गूँजता था, हास औ परिहास में।

तिश्नगी ने मुझको शर्मिंदा नहीं होने दिया ।
मेरी खुद्दारी जो आड़े, आ गई थी प्यास में ।।

राम की अज़मत, अजुध्या पर कभी निर्भर न थी।
राम का किरदार, निखरा है सुनो ! वनवास में।

लोग ,जिसको प्रेम कहते है, क्षणिक आनंद है।
स्खलन का लक्ष्य सीमित है , यहाँ सहवास में।

कापी राईट @ अरुण कुमार तुरैहा
█║▌│█│║▌║││█║▌│║█
║▌

शनिवार, 18 जनवरी 2014

आरक्षण तभी सार्थक, जब समाज शिक्षित

 हमारे लिये किसी भी प्रकार के आरक्षण की सार्थकता तभी प्रमाणित होगी जब हमारा समाज शिक्षित हो। वास्तव में आरक्षण में भी कम्पटीशन है। चमार पासी कुर्मी और यादव शिक्षा के बूते ही सब जातियों में श्रेष्ठ बने हुए हैं। हम मछुआ समुदाय के लिए SC आरक्षण तो चाहते हैं किन्तु हम अपने बच्चों को शिक्षा अथवा
बेहतर शिक्षा दिलाने के नाम पर पीछे हट जाते है और विषम आर्थिक परिस्थितियों का रोना रोने लगते है। गरीबी शिक्षा में तभी आड़े आएगी जब नियत कमजोर हो।
मेरे स्वर्गवासी दादा जी वेतन भोगी मामूली चपरासी थे किन्तु उन्होंने मेरे पिता जी को 1970 में उच्च शिक्षा के लिए नैनीताल स्थित कुमायूँ विश्वविध्यालय भेजा जहाँ मेरे पिता ने स्नातकोत्तर में न सिर्फ गोल्ड मैडल हासिल किया बल्कि डाक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त की और उच्च शिक्षित होकर अपनी गरीबी को मात दी। आज की तारीख में अच्छे अच्छे धन्नासेठ या उच्च अधिकारी भी अपने बच्चे को नैनीताल में शिक्षा दिलाने का साहस नहीं कर  सकते ,चपरासी की तो बात ही छोड़ दीजिये। अतः शिक्षित होने अथवा बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए धन से अधिक लगन एवं इच्छाशक्ति की ज्यादा जरूरत है।
दूसरी तरफ विकसित जातियों ने आरक्षण का भरपूर फायदा उठाने के लिए अपना अलग शैक्षिक तंत्र भी विकसित कर लिया है। और अपनी जड़ों को मजबूत करने में जुट गए । जाटों ने अपनी लड़कियों के लिए आर्य कन्या विद्यालय ,तो दलितों ने आंबेडकर छात्रावास का जुगाड़ कर लिया है। इसीप्रकार मीणाओं ने राजस्थान में अपने छात्रों को शिक्षित करने के उद्देश्य से मीन छात्रावास का प्रबंध सामाजिक प्रयासों से किया है। इस प्रकार जिस समाज का बचपन शिक्षित होता गया वह आगे बढ़ता गया।
शिक्षा के इसी आवश्यकता को द्रष्टिगत रखते हुए हमारे साथियों के सामूहिक-सामाजिक प्रयासों से जिला रामपुर में मछुआ समुदाय की निम्न लिखित शिक्षण संस्थाएं समाज के बच्चों को ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षित बनाने के उद्देश्य से चल रही हैं।

1-तुरैहा शिशु निकेतन ,ठिरिया सालेपुर।
2-आदर्श तुरैहा मोंटेसरी पब्लिक स्कूल,सैफनी।
3-विशाल तुरैहा पब्लिक स्कुल तिराहा।
4-तुरैहा अम्बेडकर जू हा स्कुल, तिराहा।
5-ड्रमंड पब्लिक स्कुल मिलक।
6-सन राइज पब्लिक स्कुल ,पटिया।
7-एकता पब्लिक स्कूल , लोहा 

बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने कहा था कि शिक्षा सिंहनी के दूध के समान है जो इसका प्राशन करेगा वह शेर की भांति गर्जना करेगा।

रविवार, 24 नवंबर 2013

Election....... means ..…"Fishermen first",

My definition of Election....... means ..…"Fishermen first",
=============================================
चुनावी राजनीति और जातीय गणित को समझे मछुआ समुदाय ।
दलीय प्रतिबद्धताओं को त्याग कर दलीय दलदल से निकले और मछुआ प्रत्याशियों के हित कमर कसे समाज ।
2014 लोक सभा का चुनाव मुहाने पर है और हमारा SC आरक्षण का प्रस्ताव लोकसभा में पेश होने के इंतज़ार में धुल खा रहा है । विलम्ब का कारण यह नहीं कि फलां पार्टी हमारे समाज को कुछ देना नहीं चाहती , बल्कि टालमटोल का सबब यह है कि हम लेने वालों में से हैं, … देने वालों में से नहीं अर्थात सत्ताधारी राजनैतिक दल में हमारे मछुआ समुदाय का प्रतिनिधित्व नगण्य सा है या बहुत कम है । और सौभाग्य से कुछ है भी तो वे लोग दलीय मर्यादा की रस्सी से बंधी गाय से बढ़कर नहीं जो स्वामी भक्ति की अतिशयता की हद किये डालते हैं और दलीय चारा चरते हुए गाहे बगाहे सामाजिक कार्यक्रमों में निकलते हैं और सिर्फ दलीय राग छेड़ अपनी विवशता का कीर्तन करते हैं ।
हमें दलीय सीमाओं को तोड़ कर सामाजिक रूप से सशक्त होना होगा और अधिक से अधिक मछुआ प्रत्याशी जिताकर संसद भेजने होंगे । जब केंद्रीय सत्ता में अथवा लोकसभा में ही हमारी आवाज़ को बुलंद करने वाले सांसदों का अभाव होगा तो हमारी बात कैसे और क्यों सरकार के कानों तक पहुंचेगी । अगर धुन के पक्के सिर्फ चार मछुआ MP ठान लें तो मजाल है जो संसद का सत्र एक दिन भी चल जाए ।
भारत के प्रत्येक राज्य में हमारी मछुआ आबादी है , सत्तरह राज्यों में हम SC/ST के रूप में हैं बाकी में OBC अथवा विमुक्त ।
एक हो जाये तो मछुआ समुदाय अपने संख्या बल पर देश की संसद में कम से कम 60 सांसद चुनकर भेज सकता है किन्तु विभक्त संगठन और बंटा हुआ समाज प्रायः हर चुनाव में हाथ मलता रह जाता है । हम एक नेता और एक नीति के लिए तरसते ही रहे । खेमों और धड़ों में बँटना और ऐन मौके पर बिकना ,बिखरना और बहकना हमारी नियति रही हैं । हमारे वर्त्तमान में झूठे स्वाभिमान का मोह पल रहा हैं और व्यवस्था जनित संड़ाध को अपने में समेटे हमारा समाज आगे बढ़ने का दिवास्वप्न देख रहा है जो बिना त्याग , निस्वार्थभाव और बलिदानी जज्बे के सफल होने वाला नहीं हैं ।
निषाद वैभव की पुनर्प्राप्ति के लिए आइये संकल्पित होकर मतदान करें और शपथ लें कि " वोट और बेटी समाज को ही देंगे " और आगे बढ़ अपना अधिकार लेंगे ।

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

शास्त्री जी और गुमनाम मल्लाह

भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी के बारे में एक कथा का जिक्र लोग अक्सर करते हैं । कहा जाता है शास्त्री जी अत्यंत निर्धन थे लेकिन विषम परिस्थितियों में भी अपनी पढ़ाई जारी रखे हुए थे । वे रोजाना नदी पार कर स्कूल जाते , एक बार उनके पास उनके पास मल्लाहों को देने के लिए पैसे नहीं थे तो उन्होंने तैर कर नदी पार की । इतने स्वाभिमानी थे लाल बहादुर शास्त्री जी !
………ये कथा अधूरी है। …इसके बाद की कथा का जिक्र इतिहास में जान बूझकर नहीं किया गया । ये सत्य है कि शास्त्री जी का बचपन अत्यंत विषम परिस्थितियों में बीता और विपरीत आर्थिक हालात के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी । जहाँ तक तैर कर नदी पार करने का प्रसंग है, इसमें सच्चाई है कि वे रोजाना नदी पार कर स्कूल जाते , एक बार उनके पास मल्लाह को देने के लिए पैसे नहीं थे तो वे अपने बस्ते को सर पर बाँध कर गंगा में उतर गए। …मुगलसराय गंगाघाट के मल्लाहों को जब बालक के हौसले की जानकारी हुयी तो उन्होंने कहलवा दिया कि इस बालक (लाल बहादुर शास्त्री ) से ही नहीं बल्कि विद्यालय आने जाने वाले किसी भी बालक से मल्लाह उतराई नहीं वसूलेंगे । मल्लाहों के आपसी निर्णय का तेजी से पालन हुआ और मुगलसराय ही नहीं आसपास के सभी घाटों पर विद्यार्थियों की उतराई मुआफ़ कर दी गयी । लेकिन मल्लाहों के इस निर्णय को इतिहास में कहीं मान सम्मान नहीं मिला और गुमनाम नायकों की भाति वे इतिहास में बिसरा दिए गए ।

बुधवार, 21 अगस्त 2013

कांवड़ सेवा में हीरो … समाज के नाम पर जीरो

अभी अभी सावन का महीना गुज़रा है । भोले शंकर के शिवालयों में गंगा का पवित्र जल लाकर अभिषेक करने वाले कांवरियों का हुज्जूम इस माह सड़कों हर तरफ पर दिखाई पड़ता हैं । मगर जो ताज्जुब इस बार हुआ वो पहले कभी नहीं देखा । हमारे मछुआ समाज के सैकड़ों युवा पुरेजोशोखरोश के साथ कांवरियों के स्वागत में डटे हुए थे । कुछ लोग तो महीनों पहले से चन्दा कर रहे थे ताकि जल लेकर आने वाले श्रद्धालुओं को बढ़िया शुद्ध दूध की काजू,बादाम,पिस्ता वाली खीर खिलाई जा सके , उन्हें ताजे मौसमी बेहतरीन फलों का भंडारा करने के लिए कुछ महानुभाव पूरे शहर की दुकाने तलाशे डाल रहे थे । हमारे युवा मोटर साइकिल पर भगवा ध्वज थामे मोहल्ले मोहल्ले दौड रहे थे ताकि महिलायें भारी संख्या में उपस्थित हों और मंगल आरती गायें । एक साहब तो देसी घी के चार छह टिन लिए घूम रहे थे कि कोई संस्था उन्हें उनसे ले ले । भोग भंडारे ,हलुआ पूड़ी सब्जी रायता का पूरा इंतजाम हमारे समाज के लोग लिए बैठे थे । समाज की ऊर्जा पूरे सावन कांवरियों पर व्यय हुई ,पैसा गया सो अलग …….मेरी समझ में यह नहीं आता…….यह समाज आरक्षण के नाम पर घर से क्यों नहीं निकलता । किसी मछुआ कार्यक्रम में खर्च करने पर जान क्यों निकलती है । दानियों के हाथ धर्म के नाम पर उदार हैं किन्तु जाति के नाम पर नाक भौं सिकोड़ते है । हालाँकि मैं भी वर्ष 2001 और 2003 में दो बार सौ किमी दूर गंगा घाट से काँवर लाकर स्थानीय मंदिर पर जिसे रामपुर नवाब ने बनवाया था , चढ़ा चुका हूँ ।  यों तो मैं गंगा के उदगम गौमुख सहित गंगोत्री यमनोत्री ,केदारनाथ, बद्रीनाथ, हरिद्वार ,मथुरा, चित्रकूट ,बालाजी राजस्थान ,उज्जैन महाकाल , काशी विश्वनाथ, वैष्णो देवी सहित हिमांचल की काँगड़ा देवी, चिंतपूर्णी, ज्वालादेवी ,चामुंडा देवी ,मैहर देवी मध्यप्रदेश सहित एक दर्जन शक्तिपीठ (ध्यान दें, सिद्धपीठ नहीं ) के दर्शन कर चुका हूँ लेकिन मेरा यह मानना है धर्म व्यक्तिगत विषय है सड़कों पर प्रदर्शन करने का नहीं । जाति के मामले में सामने आने से पोल खुलने का भय रहता है इसी लिए कई समाज बंधू जातीय आयोजनों से दूर रहते हैं किंतु धार्मिक आयोजनों में चौधरी की भूमिका और भामाशाह बनने को लालायित रहते हैं ।

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

दामाद बाबू !

ई का बे ! नासपीटो …….सब मिल गरियाए रहे हो दामाद बाबू को । बिलकुल सरम नाहीं , सब बिल्लात पगलाए गए हो……. सब भाजपाई झुठबे बोल रहा है और सब दौड़ाये लिए जा रहे दामाद बाबू को ! बख्शो बे । भारतीय संस्कृति में दामाद का मान सम्मान होता है भाई । पैर पूजे जाते हैं इनके । मुरादाबादी लोटा बेचने वाले दामाद साहब को कुछ पता भी नहीं है और लोग हैं कि बातें बना रहे है । दामाद बाबू घोटाला कैसे कर लेंगे ……सुना है वे तो कोई काम ही नहीं करते राहुल बाबा की तरह । अब जो आदमी कोई काम ही नहीं करता वो कमीशन कैसे खा जायेगा ?  रही बात जमीन की ……. तो सस्ता खरीदने या महंगा बेचने पर कोनऊ पाबंदी है का । लोकतंत्र है भाई देश में …… अजादी है सबको व्यापार करने की । गलत बात । दामाद जी का कुछ तो लिहाजा करो भजपईयो !
वास्तव में भारतीय संस्कृति में दामाद चाहे कितना ही निठल्ला क्यों न हो, पूजनीय होता है | सोनिया जी को लोग भले विदेशी कहें लेकिन उन्हें भारतीयों की इस परंपरा का गहराई से ज्ञान और भान है कि दामाद को कैसे सर आँखों पर बिठाया जाता है | जय हो!!!

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

ईद मुबारक

 
तुम कहो मुबारक ईद उन्हें, जो मुग़लों के रखवाले थे |
तुम कहो मुबारक ईद उन्हें, जो अकबर जी के साले थे ।1।

तुम उन्हें खिलाओ दूध सिंवई, जिनके पुरखे दरबारी थे ।
तुम मंगल गान करो उनका, जो बेटी के व्यापारी थे |2|

तुम कहो मुबारक ईद उन्हें, सिंहासन बचा लिया जिसने |
केसरिया बाना मुस्लिम के, चरणों में झुका दिया जिसने |3|

तुम उन्हें खिलाओ दूध सिंवई, जिनके सब दावे टूट गए ।
मुगलों की सेना से रण में, जो क्षमा दान पर छूट गए ।4।

तुम कहो मुबारक ईद उन्हें, जिनमे ठाकुर अंदाज नहीं ।
तुर्कों से डर कर भाई के, सौदे से आये बाज़ नही।5।

तुम मंगल गान करो उनका, जो स्वसुर बन गए यवनों के |
जो निज प्राणों के वशीभूत, विक्रेता बन गए बहनों के |6|

तुम कहो मुबारक ईद उन्हें,जो शिखा कटा कर जिन्दा हैं |
तुम कहो मुबारक ईद उन्हें, जो मूंछ तान शर्मिदा है |7|

हो जय जयकार सदा उनकी, जो यवनों के हम्प्याले थे |
हिन्दू होकर हिन्दू का ही, जो खून चूसने वाले थे |8|

तुम कहो मुबारक ईद उन्हें, जो भारत माँ के लाल बने ।
गोपाल की धरती पर रहकर, जो गऊओं के दल्लाल बने ।9।

तुम कहो मुबारक ईद उन्हें, जो अंग्रेजों के मुखबिर थे ।
जलियांवाला चिल्लाता है वो हिन्दू थे वो हिन्दू थे ।10।
सभी समाज बंधू ईद की मुबारकबाद असली नकली राजपूतों को अवश्य दे

तौमर राजपूत सिंघाडिया

कल मुझे दो व्यक्ति मिले । उनका निहायत पक्का अर्थात शुद्ध काला रंग उनके अनार्य रक्त को दूर से ही प्रमाणित कर रहा था । निश्चय ही वे किसी अन्त्यज अथवा शूद्र जाति के रहे होंगे । जिज्ञासावश मैं उन्हें देख कर ठिठक गया । वे किसी काम से बैंक आये थे । मैं भी एक चैक के क्लीयरेंस के सिलसिले में बैंक आया था । स्वभावतः मैंने उन्हें बुलाकर कुशलक्षेम के पश्चात उनका परिचय ,कार्यक्षेत्र और जाति के विषय में पूछा । मेरी जोरदार हंसी छूट गयी जब उन्होंने अपने आपको सिंघाडिया तौमर राजपूत जाति का बताया । मैंने अनजान बनते हुए कहा कि ये सिंघाडिया कौन सी जाति होती है तो वे कहने लगे तौमर राजपूत । मैंने कहा तौमर राजपूत या तौंगड़ राजपूत ? अब बारी उनके हक्के बक्के रहने की थी ।
दरअसल हिमालय के तलहटी से सटे तराई क्षेत्र में नदियाँ सीधे पर्वतों से उतर कर वनक्षेत्र में पसर जाती थीं जिस कारण यहाँ जंगलों और दलदली भूमि का बाहुल्य था । आजादी के पश्चात एक दर्जन से अधिक बाँध बन जाने के कारण नदियों ने अपना मार्ग बदल दिया और पुराने नदी मार्गों पर बड़ी बड़ी झीलें और तोड़ बन गए जो कालांतर में तालाबों में परिवर्तित हो गए । मछुआ समुदाय के जिन जातियों के लोग इन तालाबों में मछलियों का शिकार करते थे.....वे स्थानीय बोली में तुराहे धीमर कहलाये और जो लोग इन तालों में बंद ऋतुकाल में सिंघाड़े की बेल डालकर सिंघाड़ा उत्पादन करते थे वे सिंघाडिये कहलाये और इन तालाबों पर काबिज आश्रित होते गए। ये जल श्रमिक सिंघाड़ा उत्पादन में माहिर होते हैं और ट्यूब अथवा तौमे पर बैठकर दिनभर तालाब में तैरते रहते हैं । नंगे बदन दिनभर धुप में रहने के कारण इनका शरीर काला हो जाता है , ज्यादा समय गंदे पानी में रहने के कारण इनको चर्मरोग या त्वचा सम्बन्धी बीमारियाँ अधिकांशतया हो जाती है । इनके पास इसका एक घरेलू उपाय भी है…राख मलकर ये अपन त्वचा सम्बन्धी उपाय भी कर लेते हैं । चूँकि पिछड़ी जातियों में स्वयं को राजपूत कहलवाने की प्रवृत्ति आरम्भ से ही हावी थी अतः ये स्वयं को तौमर राजपूत सिंघाडिये कहलाते थे ।  ये जाति सामाजिक रूप से ग्रामीण परिवेश में लोध राजपूतों , सैनी और खडगवंशी राजपूतों यानि खागी कश्यप से काफी घुली मिली रहती थी  वे लोग इन सिघाडियों को छेड़ने अथवा चिढाने के लिए तौंगड़ राजपूत भी कहते थे ।
उन दोनॉ ने बताया कि वे बीस साल से एक बड़े तालाब पर काबिज थे जो उन्हें मुलायम सिंह जी की पिछली सरकार में वर्ष 94 में स्थानीय विधायक स्व० ज्ञानी हरिन्दर सिंह जी की सिफारिश पर दिया गया था ।  उस समय तालाब मात्र 6000 रुपयों में मिला था जिसका दस वर्ष बाद प्रथम रिन्यूवल 10000 रुपयों में हुआ , अब की बार रिन्यूवल 18000 रूपये में हो रहा था , उनके पास इतने रूपये की व्यवस्था नहीं थी नतीजतन उन्होंने तालाब का पट्टा बजरिये बयनामा कतई एक मुसलमान को रजिस्ट्री कराकर 1,30,000 रूपये में बेच दिया और उत्तराखंड जाकर भूमिहीनों में नाम लिखा आये और मकान भी वहीँ ले लिया । मैंने कहा तालाब बेचने की क्या जरूरत थी , तुम तालाब से 150 रूपये महीने यानि 5 रूपये रोज की भी बचत कर लेते तो दस वर्ष के 120 महीनों में 18000 की रकम जमा कर लेते । बोले खर्चा ही इतना है … बचत कहाँ से करें । मैंने समझाया बचत छोडो …बीडी पीना ही छोड़ देते तो 5 रूपये रोज जमाकर तालाब बचाकर ले जाते । वे निरुतर हो गए । मैंने बात सँभालते हुए पुनः कहा …. बेचना ही था तो अपने किसी मछुआ भाई को ही देते । वे कहने लगे किसी मछुआ जाति के व्यक्ति के पास इतने रूपये नहीं थे जो इस कीमत पर खरीद पाता । मैंने पुनः कहा किसी अन्य हिन्दू जाति को ही दे देते । कोई अन्य हिन्दू इस काम को नहीं करना चाहता …उनका बेलौस जवाब था ।
मैंने उन्हें बताया कि हमारे पास दो तालाब हैं, क्या उसमे वे सिंघाडे की बेल मजदूरी पर डाल सकते हैं ?  उनका जवाब था उन्हें ये काम आता ही नहीं है । अब चौंकने की बारी मेरी थी ,मैंने पूछा.....काम नहीं आता तो बीस साल से तालाब का क्या कर रहे थे ? वे बोले …मुसलमान को किराए पर दे रखा था । मैंने कहा मुसलमान क्या करता था तुम्हारे तालाब का। बोले……धीमरों से मजदूरी पर मछलियाँ मरवाता था । मैं अब झुंझलाने लगा । मैंने प्रतिप्रश्न किया ......... ये कार्य तो मछुआरों से आप स्वयं भी करवा सकते थे। वे बोले...... स्साले हमारे कहने से तैयार नहीं होते थे । बिरादरी की मजदूरी करने में शान घटती है न…। मुसलमान गाली बककर उनसे खूब काम कराता था । मैंने जानना चाहा कि फिर आपका क्या काम धंधा था। वे बोले नदी घाट पर खीरा, ककड़ी, तरबूज, खरबूज की पालेज बोते थे। मैंने शंकित होकर जाना चाहा किसकी भूमि पर ? वे सहज भाव से बोले मुसलमान की ।
मैंने अपना सर पीट लिया ।
जो समाज अपने अधिकार को खोकर सोया ही रहेगा और हाथ आये अवसर को यूँ ही छोड़ देगा साक्षात् ब्रह्मा भी उसका कल्याण नहीं कर सकते । मेरे Android फ़ोन का बैटरी बैकप जाता रहा अन्यथा उनकी फोटो खींचकर जरूर प्रकाशित करता ।

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

दूर हटो ऐ आर्य विदेशी !

स्वामी होकर सेवक रहना, हमको नहीं गवारा है ।
दूर हटो ऐ आर्य विदेशी ! भारत वर्ष हमारा है ।।

हम भारत के मूलनिवासी , एकलव्य बन जायेंगे
हम लेंगे अर्जुन से बदला, हाथ काट ले जायेंगे
पक्षपाती गुरु द्रोण भी हमसे, हरगिज़ बच न पायेगा
कल अंगुष्ठ लिया था जिसने, गर्दन दे के जायेगा
हिन्दू होकर हिन्दू का, शोषण इतिहास तुम्हारा है ।

दूर हटो ऐ आर्य विदेशी ! भारत वर्ष हमारा है ।।

नदी घाट और ताल हमारे, पूँजीवाद के नाम हुए ।
हुए बेदखल मछुआ वंशज, पैतृक हक़ नीलाम हुए ॥
बोली लगती रही हमारे, सदियों के अधिकारों पर ।
और घबराये खड़े रहे हम, बेबस बने किनारों पर
इन्तजार करते हैं फिर कोई, राम पलट कर आएगा
हमें हमारी अंधभक्ति का, मोल वहीँ दे जायेगा
रामसखा के शत्रु  बनकर कहें राम अवतारा है ।

दूर हटो ऐ आर्य विदेशी ! भारत वर्ष हमारा है ।।

भूल ना करना, नहीं समझना, अब निषाद बँट जायेगा
जो थोडा सा बचा कुहासा, अति शीघ्र छंट जायेगा
फिर देंखें किसमें दमखम है, जो टकराने आएगा
साहस की अब अग्निपरीक्षा, हाँ निषाद जुट जायेगा
सत्ता चाहे कुछ भी कर ले, अब अधिकार न छोड़ेंगे
हम अपनी ताक़त के बल पर, दरिया का रुख मोडेंगे।
हम निषाद जंगल के वासी, जल पर राज हमारा है ।

दूर हटो ऐ आर्य विदेशी ! भारत वर्ष हमारा है ।।

कापीराईट @ अरुणकुमार तुरैहा

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

नए सामाजिक नामकरण और सामाजिक परिवर्तन

आदि कालीन भारत का मूल निवासी समाज विदेशी आक्रान्ताओं का सदैव शिकार हुआ और विदेशी आक्रमणकारियों के हमले से यहाँ की मूल निवासी जातियों की संस्कृति , भाषा, कला ,साहित्य , वेशभूषा ,बर्तन ,भवन निर्माण कला और संगीत तक प्रभावित होते गए।   आर्यों के हमले से लेकर शक ,हूण, मंगोल ,मलेच्छ , यवन और अंग्रेजों तक ने हमारी संस्कृति को न केवल प्रभावित किया बल्कि उसे बदल भी दिया

 विदेशी लोगों के आने पर सबसे पहला परिवर्तन बोली पर पड़ा। नई भाषा की वजह से लोगों के उच्चारण बदलते गए और नए शब्दों का चलन समाज में बढ़ गया फलस्वरुप एक ही शब्द के कई समानार्थी ,समवाची अथवा पर्यायवाची विकसित होते गए। बाद में उनके रूप और भी ज्यादा बिगड़ने लगे और अपभ्रंशों की भरमार होती गयी।
यहीं से मछुआ जातियों के नामकरण में मल्लाह , कहार जैसे विदेशी शब्द प्रचलन में आये जो हमारी मूलभूत निषाद संस्कृति के प्राचीन नामों, जिनमे धीवर, कैवर्त , केवट, मांझी, मछुआ प्रमुख थे , पर भारी पड़ते गए और मूल नामों में समाहित होने के बजाय उन्हें परिभाषित कर उनका प्रतिनिधित्व करने लगे। कालांतर में इनमे शिक्षित-अशिक्षित,ग्रामीण -नगरीय, परिष्कृत -देशज ,तत्सम -तद्भव के विभेद भी सामने आते गए और मछुआ समाज लगभग सौ नए नामों से अपनी पहचान गढ़ता गया। वास्तव में समाज के ये नए नाम भारत के बदलते नेतृत्व की भाषा के अनुसार ही ज्यादा प्रचलित हुए। 

बाद में विषम पारिस्थैतिक एवं आर्थिक परिस्थितियोंवश परम्परागत व्यवसायों  के बंटवारे अथवा आजीविका हेतु नए रोजगार के साधन अपनाने के कारण भी मछुआ समाज को नए नामों से जाना गया।  हालाँकि इन नए नामों का परिवर्तन भी समाज पर पड़ा और समाज में बदलाव भी द्रष्टिगोचर हुआ | कहीं नए नामों के फलस्वरूप स्थितिजन्य सामाजिक बदलाव देखा गया तो कहीं सामाजिक स्तरोन्न्यन नए नामकरण की वजह बना | निरंतर परिवर्तनशील भारतीय सामाजिक व्यवस्था में समाज के हर स्तर में परिवर्तन देखे गए जिसकारण जातियों के बड़े समूह छोटे समूहों में विभक्त होते गए और हर बार एक नए नाम के साथ स्वतंत्र पहचान बनाते गए। उपजातियाँ विकसित होने लगी और मूल जातियों से प्रथक आस्तित्व बनाती गयीं। इसके दो कारण रहे ,

1 अस्पर्शता यानि अन्त्यज जातियों के घृणित पेशेजनित लोकव्यवहार सम्बन्धी निर्योग्यता।
2 औद्योगिककरण के फलस्वरूप मूल आजीविका में आये परिवर्तन।

अब तक गोत्रहीन कहे जाने वाले समाज भी अब अपना गोत्र दूंढ लाये और समाज के नए नामकरणों की दिशा देखादेखी तय होने लगी

सोमवार, 29 जुलाई 2013

सम्राट अशोक और मछुआ समुदाय

12 वीं शताब्दी में कल्हण कृत राजतरंगिणी में स्पष्ट उल्लिखित है कि सम्राट अशोक की पांच पत्नियाँ थी जिनमे 1 -देवी ,2-आसन्दिमित्रा , 3-तिष्यरक्षिता , 4-पद्मावती और 5- कौरवाकि जालौक थी । इनमे  कौरवाकि जालौक कलिंग राज्य की मछुआ समुदाय की धीवर जाति की थी । धीवर कन्या के सौन्दर्य पर मोहित होकर अशोक ने उसे मान सम्मान सहित अपनी रानी बनाया ,  अशोक को अपनी इस धीवर रानी से तीवर (तीव्र ) नामक पुत्र की प्राप्ति हुई
फिल्म अभिनेता शाहरुख़ खान द्वारा अभिनीत फिल्म अशोका दी ग्रेट में करीना कपूर ने मछुआ कन्या अशोक पत्नी कौरवाकि जालौक की भूमिका को परदे पर जीवंत किया था ।
इसके अतिरिक्त इतिहास में पूरण कश्यप और कश्यप मातंग भिक्षुक का भी जिक्र मिलता है । जिनके बारे में  इतिहास में लिखा है कि जैन दर्शन से प्रभावित पूरण कश्यप घोर अक्रियावादी था और उसने कर्मफल सिद्धांत का विरोध किया । उसके अनुसार मनुष्य के अच्छे बुरे कर्मों का कोई फल नहीं होता । वहीँ बौद्ध मत से सम्बद्ध कश्यप मातंग भिक्षुक का बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए चीन जाने का उल्लेख भी है ।
हर्यक वंश के अजातशत्रु के शासन काल में प्रथम बौद्ध महासंगीति राजगृह ,बिहार में संपन्न हुयी थी जिसकी अध्यक्षता महाकश्यप भिक्षुक ने की ...हालाँकि इनमें से किसी भी कश्यप का वर्तमान मछुआ वंशजों से सम्बन्ध प्रमाणित नहीं हो सका है ।

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

ऐतिहासिक भूल या अक्षम्य अपराध ..!

सच बात तो ये है कि आरक्षण केवल अछूतों के लिए दस वर्ष हेतु ही घोषित किया गया था । उस समय पिछडा वर्ग या जाति जैसी संकल्पनाएँ नहीं थी । 1931 की जनगणना के पश्चात पूना पैक्ट के आधार पर 1933 में Untouchable एंड Depressed Castes की सूची तैयार की गयी और उन्हें समुचित प्रतिनिधित्व हेतु सरकारी सेवाओं में आरक्षण अनुमन्य किया गया । संविधान आदेश 1950 जो कि अनुच्छेद 341 (1 ) के आधार पर पारित किया गया था , उसमे अनेकों जातियों ने शामिल होने अथवा निष्कासन का प्रत्यावेदन दिया .......कुछ जातियों ने तो उस समय इस आदेश का इतना विरोध किया कि संसद भवन के आगे धरना प्रदर्शन व हड़ताल कार्यक्रम तक कर डाले । अत्यंत खेद जनक रहा कि इसके विरोध में कश्यप राजपूत सभा पंजाब सबसे आगे रही। यादव, कुर्मी, लोध ,नाई ,हलवाई गडरिया गूजर जातियों ने भी प्रस्तावित आरक्षण में अपनी जातियों को भंगी ,चूहड़ा ,चमार, खटिक ,नट , धोबी के साथ रखे जाने पर घोर आपत्ति जताई और अपने आप को उस सूची से निकलवा कर ही माने । इस आपत्ति का प्रमुख कारण इन जातियों की तथाकथित राजपूती मर्यादा , फर्जी और तथ्यहीन राजशाही प्रष्टभूमि की झूठी शोबाजी रही ।
किन्तु पांच वर्षों में इन पिछड़े वर्गों की आँखें फटी की फटी रह गयीं जब चूहड़े ,चमार अफसर बनकर इनके सरों पर सवार हो गए और झोलाछाप फर्जी ठाकुरों को उन्हें उल्टा सलाम बजाना पड गया । अब खिसियाये पिछड़े भी अपने लिए आरक्षण चाहते थे सो काका कालेलकर आयोग बनाकर सरकारों ने कमीशन ..कमीशन का खेल खेला और ये खेल मंडल आयोग लागू होने तक बदस्तूर जारी रहा । सच्चाई तो ये है हमारा समाज मंडल आयोग की लड़ाई के वक़्त भी आराम से घर में लेटा था ...और यादव - कुर्मी जातियां अपने अधिकारों और आरक्षण की लड़ाई सड़कों पर लड़ रही थी .....तब  पिछड़ों की इस लड़ाई में अनुसूचित जातियों का भी सहयोग रहा था ...क्योकि सवाल आरक्षण व्यवस्था के आस्तित्व का था ।
अत्यंत दुर्भाग्य पूर्ण है कि 1949 -1950 में कश्यप समाज के पुरोधाओं द्वारा किये गये अपराध से समाज से छूटी ट्रेन आज भी हमारे हाथ नहीं आ सकी हैं । 

रविवार, 14 जुलाई 2013

हमारे युवा कब महसूस करेंगे ?

पुरातात्विक विश्लेषकों के अभिमतों की विवेचना कर मछुआ समुदाय का इतिहास लोगों के सामने रखों तो असलियत स्वीकारने में हिचकते है ...कहते हैं हम तो राजपूत थे । इतिहासकारों के सौ डेढ़ सौ साल पुराने तथ्यों का उल्लेख कर भारत की आदि निवासी मछुआ जाति पर कुछ लिखो तो कहते हैं .... हमारे दादे परदादे क्या थे ...हमें नहीं पता ....हम कश्यप हैं और महर्षि कश्यप की संतान हैं । हमारी साठ हजार परदादियाँ थी । धीवर, कहार, केवट ,मल्लाह के नाम से चिढने वाला समाज आज अपनी असलियत को भूल आधुनिकता की तथाकथित चादर तान सो जाना चाहता हैं । युवा कहते हैं ..हमें आरक्षण की क्या जरूरत हैं ..हम अपनी मेहनत से ही सब कुछ पाना चाहते हैं । आरक्षण तो भंगी और चमार या उनके समकक्ष होने की पहचान है । ज्यादा कहो ..तो कहते हैं ....हमें OBC का आरक्षण मिल तो रहा है ...क्या परेशानी है ?
विरोध नहीं करने की आदत ने हमारे अन्दर ही हमारे शत्रु पैदा कर दिए है ...जो विरोध करने वाले के पीछे लग जाते हैं और आपस में टांग खींच कर खुश होते हैं । सरकारें मनगढ़ंत निर्णय कर हमें और नुक्सान पहुंचा रही हैं ...हम एकता का ही रोना रोते रहे ।
वस्तुतः निषाद, केवट ,मांझी ,  मल्लाह , नाखुदा , जहाजी , एक ही शब्द हैं, लिहाजा एक जाति हैं । जबकि वास्तव में ये शब्द भाषाई एतबार से अलग है । निषाद संस्कृत का शब्द है ..जबकि केवट और मांझी उसी के हिंदी रूपांतर हैं ..इसी प्रकार मल्लाह उर्दू का शब्द हैं जबकि नाखुदा और जहाजी इसी के फारसी रूपान्तर है । इसी को अंग्रेजी में बोटमैन या फैरीमैन कहते हैं तो क्या एक ही अर्थ वाले सभी शब्द अलग अलग हो गए ? और अलग अलग जाति या प्रकार हो गये ... बिखरते गये ।
इसी प्रकार कहार शब्द उर्दू है जो कुलीगिरी काम काम करने वालों के लिए प्रयुक्त किया जाता था ..जिसे अमीरों ने पालकियों के वाहकों से जोड़ दिया । वास्तव में ये भी संस्कृत के स्कंधकार से बना हैं । इसी प्रकार धीवर धैवर्त से उद्धरत ..तत्पश्चात धीमर ,झीमर झिम्मर चिम्मड़ के रूप में अपभ्रंशित हैं । सरकारों में बैठे आठवाँ पास बाबू इन्हें अलग अलग मान कर क्रम संख्याएं बाँट रहे हैं ....और नित नई व्याख्याएं पेशकर रहे हैं । समाज बंटा जा रहा हैं .....हमारे लोग अपना अतीत राजवंशों और रजवाड़ों में तलाशते घूम रहे हैं । 

मेरे सामने टीवी पर मोदी का पुणे के फर्ग्युसन कालेज में दिया व्याख्यान लाइव चल रहा है ...चीन का भय दिखा कर ही सही ......मोदी जी लोगों को एक जुट करने का आह्वान कर रहे हैं ...और इसमें युवाओं को महत्त्वपूर्ण बता रहे हैं ..विश्व व्यापार में भारत की ऐतिहासिकता और हमारी प्राचीन मरीन इंजीनियरिंग का हवाला  देकर मोदी भाई ताली बजवा रहे हैं ....पता नहीं हमारे युवा मछुआ समाज का गौरव और एकजुटता की आवश्यकता कब महसूस करेंगे ?

शनिवार, 13 जुलाई 2013

कांग्रेस सन सैतालिस से हमें ठग रही है !


क्या मछुआरों को उत्तर प्रदेश सरकार के प्रस्ताव पर SC आरक्षण मंजूर करते ही केंद्र सरकार गिर जायेगी .........श्री प्रकाश जायसवाल को इतना बड़ा झूठ बोलने तनिक भी शर्म नहीं आई ...और बेहयाई से मछुआ समुदाय को ब्लैक मेल करते हुए मंत्री जी पूर्ण बहुमत की सरकार हेतु वोट मांगते हुए कहते हैं कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाओ तो SC स्टेटस मिलेगा । अगर ये सच है कि मछुआरों को SC  आरक्षण देते ही केंद्र सरकार गिर जायेगी तो कांग्रेस के इस मंत्री को उन लोगों के नाम भी उजागर करने चाहिए जो मछुआ आरक्षण पर कांग्रेस सरकार का विरोध कर रहे हैं और सरकार गिराने की हैसियत में भी हैं । उनके नाम और चेहरे सामने आ जायेंगे तो मछुआ समुदाय को आरक्षण विरोधियों से जूते की चोट पर सड़कों पर निबटने में आसानी होगी ।
दरअसल कांग्रेस और उसके मंत्री फर्जी बात बोलने में और मछुआ जातियों को गुमराह करने में महारत रखते हैं और हमारे लोगों को बेवकूफ समझते हैं । ...वे भूल रहे हैं कांग्रेस ने इस देश में 54 साल राज किया है और सदैव मछुआरों को धोखा ही दिया हैं ।
गोंड ,तुरैहा खरवार , मझवार और बेलदार को SC रिजर्वेशन महज नाम भर के लिए दिया । 31 अगस्त 1952 को अपराधी जाति अधिनियम 1871 के विखंडन के उपरान्त जरायमपेशा के तमगे से आजाद हुयी धीमर, केवट ,मल्लाह बिंद जातियों को उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति में आज तक शामिल नहीं किया जबकि उसके साथ दर्ज रही भांतु , बाबरिया , बेडिया, नट , चिड़ीमार ,बहेलिया , साँसी सहारिया को तत्काल ही SC सूची में शामिल कर लिया गया । कांग्रेस हमेशा से ही मछुआ जातियों के प्रति अपना दुश्मन नजरिया प्रदर्शित करती आई हैं । वस्तुतः इसके पीछे कांग्रेस नीत तथाकथित आजादी की लड़ाई का श्रेय लेने की होड़ रही जिसमे मछुआ समुदाय की जातियों ने राष्ट्रवादी भावनाओं का प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस और गाँधी की चाटुकारिता करने से इनकार कर दिया था और उग्र दल के साथ रहे ...नेहरु ने हमेशा ही इन जातियों को समाज विरोधी माना और वे इन्हें मुख्यधारा से दूर रखने के हिमायती रहे .....
गाहे बगाहे कांग्रेस नेहरु गाँधी की उसी सड़ी गली परंपरा को कही न कहीं आज भी ढोने का प्रयास करती नजर आती हैं  ।

शनिवार, 6 जुलाई 2013

आप भी यहाँ से विलुप्त हो जाएँ .....।

 दुनिया के किसी शब्द कोष में मांझी ,मल्लाह और केवट की व्याख्या भिन्न नहीं है और सभी एक दुसरे के पर्यायवाची हैं । लेकिन हमारी सरकारें इन्हें अलग अलग मानती हैं । समाज कल्याण के एक बाबू चुटकुला सुनाते हुआ कहते हैं कि बाबू की मारी हलाल होती है । यानि बाबू जो चाहे कर सकता हैं ...लिख सकता हैं । यह देश और इसके अफसर बाबुओं की सलाह पर चलते हैं .......अफसर अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं करते , फंसने से डरते हैं न । बाबूजी कहते हैं ......हमारी मर्जी ...हम जैसी चाहें व्याख्या सचिवालय से निकालें ...जिले के अफसर उसकी पटरी बनाकर रेल दौड़ाते नजर आएंगे । हम Majhi को मजही लिखेंगे ......कोई हमारा क्या उखाड लेगा । हम माँझी और मजही का भेद दुनिया को सिखायेंगे ....कोई हमारा क्या कर लेगा ? हम अंग्रेजी में लिखे MAJHI शब्द का उच्चारण भूलकर भी माझी नहीं करेंगे ...जब भी लिखेंगे मजही लिखेंगे ? हमने परीक्षा पास की है ..कोई ऐसे तो थोड़े बैठ गए हैं इस कुर्सी पर ...संविधान की जनकारी है हमको । दुसरे बाबू पान की पीक थूकते हुए बोले ......केवट और मल्लाह अलग अलग है ....हम प्रमाणित कर सकते हैं । हम कहे कैसे ? तो बतियाने लगे ...केवट गरीब होता है सो अकेला नैया खेता हैं ...यानि उसकी नाव छोटी होती है ....इस प्रकार केवट एक इकाई है अतः मल्लाह से प्रथक हैं । जबकि मल्लाह समूह में काम करते हैं ...मल्लाहों पर बड़ी बड़ी नावें होती है जिसे दस बारह लोग खेते हैं । समूह में रहने के कारण ये लोग चोर उचक्कई भी खूब करते हैं ....नाव खरीदना आसान काम नहीं है ....जाहिर सी बात है मल्लाह पेशा करने वाली मल्लाह एक मालदार कौम हुयी । मांझी को कोई आरक्षण नहीं मिलेगा .......मिलेगा भी तो केवट वाला OBC का .......। मजही के आरक्षण से दूर रहो सालो।
हमने कहा तुम्हारा दिमाग खराब है । वो बोले आप MBBS डाक्टर होते तो आपका तर्क मान लिया जाता ...लेकिन आप सडकछाप हो ..सडक पर जाओ और चिल्लाओ ....।
हमने कहा तुमभी तो मोची हो .....चमार बने बैठे हो ....मोची जाति पिछड़ी जाति में आती है ...चाहे तो लिस्ट देख लो OBC की यूपी वाली । जब पिछड़ी जाति का मोची ...चमार कहलवा कर SC का आरक्षण झटक सकता है तो मल्लाह को मझवार क्यों नहीं माना जा सकता है ? वे बोले मझवार यूपी में नहीं पाए जाते ....हमने कहा तो कहाँ पाए जाते हैं .....? कहते हैं द्रविड़ियन कास्ट थी ....विलुप्त हो गयी ।
आप भी यहाँ से विलुप्त हो जाएँ .....। फिर चार पांच बाबू आस्तीने चढ़ाये ....मरने मारने का जज्बा लिए आ धमके ...मुझे शौचालय में घुस कर जान बचानी पड़ी ।