शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

झूठे आश्वासनों में विकास की बाट जोहता बुंदेलखंड : त्रासदी और कब तक ?

प्रिय मित्रों,

इसे बुंदेलखंड के आम जनमानस की त्रासदी ही कहा जायेगा कि आज तक विकास के कोरे ,थोथे और झूठे आश्वासनों के अलावा यहाँ के निवासियों के कुछ हाथ नहीं आया है | कभी बेहद संपन्न और आत्मनिर्भर रहने वाला बुंदेलखंड आज सरकारी तंत्र की उपेक्षा और जनविरोधी नीतियों के चलते बदहाल , कंगाल और उपेक्षित जीवन जी रहा है | 1.5 करोड़ की आबादी का बुंदेलखंड आज बुनियादी सुविधाओं जैसे पेय जल, शिक्षा, कृषि, उद्योग ,बिजली, सड़क, सिंचाई के संसाधन के घोर अभाव के चलते अपनी ही आबादी का बोझ उठाने में लाचार हुआ जाता है | बदहाल और कर्जमंद किसान आत्महत्याएँ कर रहे हैं | परेशान मजदूर पलायन कर रहे हैं | बेरोजगार नव युवकों को पुलिस चोर बनाये डाल रही है | घोषणाएं तो सरकार किये जाती है किन्तु हो कुछ नहीं रहा है |
ऐसे में प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह और राहुल गाँधी के 30 अप्रैल के बुन्देल खंड दौरे को लेकर लोगों की आशाओं और उम्मीदों के बुझते चिराग फिर जल उठे हैं |
केंद्र की UPA सरकार और उसकी मुखिया श्रीमती सोनिया गाँधी ने 2004 में सरकार बनाने के पश्चात् अपने एजेंडे में बुंदेलखंड के विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई थी किन्तु 7 वर्षों में बुंदेलखंड के हाथ छलावे के अतिरिक्त कुछ लगा नहीं है | उद्योगों के प्रति सरकारी उदासीनता एवं लापरवाही का आलम ये है कि बंद पड़े कारखाने चोरों की आरामगाह बने हुए हैं , जो मशीनरी व सामान बचा खुचा है , उसकी रखवाली भी टेडी खीर साबित हो रही है |
आज स्थिति ये है कि,
1 बुन्देल खंड की प्रमुख कताई मिलें बंद |
2 बरगढ़ (चित्रकूट) का कांच कारखाना जो कि एशिया में सबसे बड़ा है , बंद | बिक्री के कगार पर |
3 झाँसी ,बबीना, भरुआ सुमेरपुर , बांदा, चित्रकूट और महोबा की अधिकाँश औद्योगिक इकाइयां बंद , शेष बंदी के कगार पर |
4 बुंदेलखंड के उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए गुडगाँव और नॉएडा की तर्ज़ पर दी जा रही विद्युत् सब्सिडी बंद|
5 औद्योगिक इकाइयों और उससे जुड़े प्रबंध तंत्र की सुरक्षा बंद |
6 उदासीनता एवं लापरवाह औद्योगिक नीति के कारण हजारों मजदूर बेरोजगार और करोड़ों रुपयों की औद्योगिक संपत्ति कबाड़ में तब्दील |
7 बुन्देलखण्ड में औद्योगिक इकाइयों के पुनर्जीवन एवं पुनरोद्धार के लिए विशेष पॅकेज की व्यवस्था बंद |

आशा है दम तोड़ते उद्योगों पर प्रधान मंत्री व राहुल गांधी इस दफा कुछ विचार अवश्य करेंगे |

कृषि एवं सिंचाई दोनों के मामले में बुंदेलखंड का सबसे अधिक शोषण हुआ है | सूखाग्रस्त किसान आज भी घोषणाओं के पूरा होने की हसरत दिल में लिए बैठे है | क़र्ज़ माफ़ी की फाइलें आज भी मंज़ूरी की मोहरों की मुन्तजिर हैं | लगातार कई वर्षों से पड़ रहे सूखे से निपटने के लिए सरकार ने कोई कारगर योजना नहीं बनाई है नतीजतन आज भी किसान आत्महत्या और पलायन जैसे कठोर कदम उठाने को विवश हो रहे हैं | आज ही बांदा के नरैनी थाना क्षेत्र के पड़मई ग्राम निवासी श्री जग प्रसाद तिवारी ने क़र्ज़ का बोझ न संभाल पाने और सरकारी आरसी से परेशान होकर जान दे दी | अभी विगत दिनों क़र्ज़ में दबे महोबा के झिर सहेबा गाँव के श्री राम विशाल उर्फ़ बब्बू कुशवाहा ने भी अपनी ज़मीन अधिग्रहण का मुआवजा न मिलने की वज़ह से आत्महत्या कर ली | दोनों सरकारों के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी |
मेरी मांग है कि
1 -सूखा - पाला प्रभावित किसानों के कृषि ऋण तत्काल माफ़ किये जाएँ
2 -बिजली के दो - दो लाख रुपयों के भेजे गए फर्जी बिल औए उससे जुडी आरसी रद्द की जाये |
3 -सरकार गंग नहर की तर्ज़ पर बुन्देल खंड में भी यमुना नहर बना कर नहर प्रणाली से सिंचाई व्यवस्था को मज़बूत करे | इसके लिए औगासी में यमुना घाट पर डाम बना कर और वहां से नहरें निकाल कर समस्त बुन्देलखण्ड को सिंचाई के बेहतर अवसर प्रदान किये जा सकते हैं | जब रेगिस्तान में नहरों का जाल बिछाया जा सकता है तो बुन्देलखण्ड में क्यों नहीं ?
4 -अर्जुन सहायक बाँध परियोजना का विस्तारीकरण करते हुए इसका दायरा केवल बुन्देलखण्ड की सूखी धरती तक पानी पहुचाने हेतु सीमित किया जाये |
5 -उ० प्र० सरकार के सहयोग से म० प्र० में बने रनगवां बाँध ,गगऊ बांध एवं बरियारपुर बांध से बुंदेलखंड को पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध कराया जाये | जल बंटवारे में उ० प्र० को 85 % तथा म० प्र० को 15 % जल आपूर्ति निर्धारित थी | इन बांधों की मरम्मत का जिम्मा उ० प्र० सरकार का है |

मनरेगा योजना का दुरूपयोग बुन्देल खंड में आम है | मेरा मानना है कि राजनैतिक फायदे के उद्देश्य से चलाई जा रही इस योजना को तत्काल बंद कर जनोपयोगी योजना सरकार चलाये या फिर इसमें बढ़ रहे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाए | साधनों को तरसते बुन्देलखण्ड में यदि सरकारी धन की लूट बंद हो जाये तो विकास के रास्ते तो स्वयं ही खुलते चले जायेंगे |
30 अप्रैल को मनमोहनी आश्वासनों और राहुली दौरों से बुन्देलखंडी मानुष फिर दो चार होंगे , समय फैसला करेगा कि ये कार्यक्रम हवाई / राजनैतिक साबित होगा या दर्द से कराहते बुन्देलखण्ड के ज़ख्मों पर किसी राहतबर मरहम का काम करेगा |

रात तो वक़्त की पाबंद है, ढल जाएगी |

देखना ये है, चिरागों का सफ़र कितना है ||

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

बाबा साहेब डा०भीम राव अम्बेडकर के जन्म दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं |

प्रिय तुरैहा भाइयो और बहनों ,
 
दलितों,शोषितों,वंचितों तथा पिछड़े - अतिपिछडे वर्गों के मसीहा, भारत ही नहीं अपितु विश्व में मानवाधिकारों के सच्चे पैरोकार, विश्व में अतुलनीय भारतीय संविधान के शिल्पी, भारत रत्न बोधिसत्व बाबा साहेब डा०भीम राव अम्बेडकर के जन्म दिवस की १२० वीं वर्षगाँठ के पुनीत अवसर पर समस्त देश व प्रदेशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं |
अत्यधिक सामाजिक अत्याचार के भुक्त भोगी, असहनीय अन्याय के अनुभवी और बहिष्कृत एवं सामाजिक भेदभाव का दंश झेल चुके बाबा साहेब डा० अम्बेडकर ने सदियों से उजड़े, पिछड़े, दलित, शोषित, पीड़ित, वंचित एवं बहिष्कृत जातियों को दलित घोषित कर संविधान में सामाजिक न्याय व्यवस्था का प्रावधान करके  उन्हें सुरक्षा कवच प्रदान किया | देश के दलितों को राष्ट्र की मुख्य धरा एवं धारा से जोड़ने वाली आरक्षण व्यवस्था के आप प्रणेता रहे | उसी का सुखद एवं दूरगामी परिणाम हुआ कि अनेक लोग अपने जीवन स्तर व आजीविकाओं में परिवर्तन लाकर लगभग सामाजिक बराबरी का जीवन जी रहे हैं|
किन्तु खेद है, आज अम्बेडकरवादियों की दलितों की ही सरकार में उपेक्षा की जा रही है | अम्बेडकरवादी हाशिये पर हैं और दलित विरोधी सत्ता के स्वामी हुए जाते हैं | बाबा साहेब ने जीवन भर जिस व्यवस्था से संघर्ष किया आज मायावती जी उन्ही से समझौता करके निसंदेह अम्बेडकर वादियों  का अपमान ही कर रहीं हैं | जिसके साथ संघर्ष ठहरा , उससे समझौता कैसा ?
दलित उत्पीडन के सारे रिकार्ड, दलित हितों का दिखावा करने वाली बसपा सरकार में टूट गए हैं | दलित अधिकारी कर्मचारी जितना बसपा सरकार में परेशान हुए हैं, उतना कभी नहीं रहे | शर्म आती है कहने में ,लेकिन कड़वा सच है कि दलित महिलाओं के सर्वाधिक शील भंग इसी सरकार में हुए , कई में तो बसपा विधायक नामज़द हैं | ये अनु०जाति / जनजाति आयोग की रिपोर्ट बताती है |
                इतना ही नहीं, दलितों का दम भरने वाले , जो स्वयं को तथाकथित रूप से अम्बेडकरवादी भी घोषित किये हुए हैं , एक जातिवादी मानसिकता रखकर दलितों में ही विभाजन की प्रष्ठ भूमि तैयार किये जा रहे हैं | दलितों में ही एक तबका बना जा रहा है जो सत्ता के बावजूद कमज़ोर है, योजनाओं के बावजूद पीड़ित है, आरक्षण के बावजूद वंचित है, सामाजिक न्याय के बावजूद शोषित है और दलितों की ही सरकार में बहिष्कृत है | यदि ये सर्वहारा और वंचित वर्ग अपने अधिकारों के लिए दलितों के ही मुकाबले आ गया तो दलितों में विभाजन का दोषी कौन होगा ?
ये बाबा साहेब के मिशन को पीछे धकेलने की और बाबासाहेब का कद छोटा करने की मनुवादी साजिश है जिसमे कुछ सत्ताखोर दलित भी शामिल हैं |
आइये संकट की इस घडी में विचार करें कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में दलित राजनीति की दशा और दिशा क्या है और वास्तव में इसे कहाँ होना चाहिए ? ये ज्वलंत प्रश्न हैं दलित चिंतकों के लिए, ये चुनौतियां हैं अम्बेडकर वादियों के लिए और ये सवाल हैं संविधान प्रेमियों के लिए | दलित राजनीति का लक्ष्य येन केन प्रकारेण सत्ता हथियाना नहीं बल्कि सम्मान पूर्वक दलितों एवं वंचितों का पुनर्पद्स्थापन और खुशहाल व विकसित जीवन यापन होना चाहिए |
                     सत्ताखोर दलित नेताओं के हाथों से यदि मिशन आजाद करा सके तो यही बाबा साहेब को सच्ची श्रद्धांजलि होगी | 


शुक्रवार, 18 मार्च 2011

प्रिय तुरैहा बंधुओ , 
आप सभी ब्लॉग पाठकों को होली की ढेर सारी बधाईयाँ , होली का त्यौहार आपके जीवन में खुशियों के सारे रंग घोल दे | ऐसी मंगल कामनाएं हैं |
तुरैहा जाति के लाभार्थ यह नवीनतम शासनादेश भाई रामायण प्रसाद तुरैहा (देवरिया), अध्यापक नथुन प्रसाद तुरैहा (बलिया) कुलदीप कुमार तुरैहा एडवोकेट (मुरादाबाद) एवं प्रमोद कुमार तुरैहा (बरेली) के अथक प्रयासों से जारी हुआ है | समाज बन्धु इसे लेकर अधिकारियों से मिल सकते हैं |


गुरुवार, 3 मार्च 2011

अराजनीतिक बुद्दिजीवियों से सवाल

एक दिन / मेरे देश के / अराजनीतिक बुद्दिजीवियों से / जिरह करेंगे / देश के सबसे सीधे सरल लोग / उनसे पूछेगे, वे क्या कर रहे थे / जब उनका देश मरा जा रहा था / धीरे-धीरे /नरम-नरम आग की तरह नन्हा और अकेले ।

कोई उनसे नहीं पूछेगा /उनके खूबसूरत लिबास की बात / दोपहर के भोजन के बाद की / लंबी नींद की बात / कोई नहीं जानना चाहेगा / शून्यता के तमाम सिद्दान्त के साथ / उनकी बांझ लड़ाई / कैसी थी / कोई नहीं जानना चाहेगा, वह तरीका कौन सा है / जिसके जरिए उन्होंने इकठ्ठा किया - रुपया पैसा / उनसे सवाल नहीं किया जायेगा / ग्रीक - पुराणों के बारे में / या नहीं पूछा जायेगा / अपने को लेकर उन्हें कितनी उबकाई आ रही थी / जब उनके भीतर / मरना शुरु किया था एक / कायर की मौत / उनका अनूठा आत्मसमर्थन / जिसका जन्म /शुरु से अंत तक झूठ था  / उसके बारे में कोई सवाल नहीं पूछेगा ।

उस दिन / आएंगे सीधे सरल लोग / अराजनीतिक बुद्दिजीवियो की किताब या कविता में / जिन्हें जगह नहीं मिली / मगर जो लोग रोज उनके लिये जुटाते गये है / उनकी रोटी और दूध / उनकी तौलिया और अण्डे / जिन लोगों ने उनकी कमीज की सिलाई की है /जो लोग उनकी गाड़ी चलाकर ले गये है / जो लोग उनके कुत्ते और बगीचे की देखभाल करते रहे है / और उनके लिये खटे है |

वे पूछेंगे ......../ क्या कर रहे थे तुम लोग / जब दुख तकलीफ से नेस्तानाबूद गरीब लोग मरे जा रहे थे, / और स्निग्धता और जीवन / उन में जल भुन कर खाक हो रहे थे? / हमारे इस सुन्दर देश के / अराजनीतिक बुद्दिजीवियों ! / उस समय कोई जवाब नहीं दे पाओगे तुम लोग । /


चुप्पी का एक गिद्द / तुम लोगों की गुदा और अंतडी फाड़कर खायेगा, / तुम लोगों की अपनी दुर्दशा ही / खरोंच-काटकर फाड़ती रहेंगी तुम लोगों की आत्मा, / और अपने ही शर्म से सिर झुकाए / तुम लोग गूंगे बने रहोगे ।

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मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

माया दो जबाब : क्या कोरी और हिन्दू जुलाहे दो पृथक जातियां हैं ?

अंततः ये स्पष्ट होने जा रहा है कि अब हिन्दू जुलाहे अनुसूचित जाति में नहीं गिने जायेंगे | क्योकि उत्तर प्रदेश की अनुसूचित जाति में घोषित कोरी जाति को सरकार हिन्दू जुलाहे का पर्याय न मान कर भिन्न मान रही है | जब कि पिछले कई सालों से कोरी बुनकर समाज अनुसूचित जाति का आरक्षण लेता चला आ रहा है | ऐसे में यकायक कौन से ऐसे ऐतिहासिक और संवैधानिक दस्तावेज़ सामने आ गये जो सारा मुआमला उलटाया जा रहा है | हिन्दू जुलाहों को पिछड़ी जाति में डाल कर सरकार क्या साबित करना चाहती है ? एक समाज के विकास के रास्ते बंद करके दूसरे चहेते सजातीय समाज के लिए मैदान साफ़ करके, सामाजिक सहिष्णुता और दलित भाईचारे के नाम पर धोखा दे कर,  गरीब और सदियों से उपेक्षित रहे बुनकर समाज को अपने इशारों पर नाचने वाले शोध संस्थान की मनगढ़ंत व हास्यास्पद  रिपोर्टों के आधार पर अब एकाएक अनुसूचित जाति के आरक्षण से वंचित कर देना न केवल गैर कानूनी है बल्कि तानाशाही की पराकाष्टा भी है |

आदरणीया बहन जी जानती हैं कि प्रदेश कि अनुसूचित जाति सूची में परिवर्धन , अपमार्जन व संशोधन की प्रक्रिया बेहद जटिल व उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर का विषय है | इसलिए उन्होंने कोरी जाति का पर्याय हिन्दू जुलाहे को पिछड़ी जाति घोषित करने का फैसला किया है | अब सवाल ये है कि अगर हिन्दू जुलाहे पिछड़े वर्ग के माने जायेंगे तो कोरी किसे कहा जायेगा ? और किन  लोगों को इसका लाभ लेने दिया जाएगा ? कोरी को तो उ० प्र० सरकार सूची से हटा नहीं सकती , वो केंद्र सरकार का क्षेत्राधिकार है | इसलिए जानबूझ कर भ्रम पैदा करने व आरक्षण में बाधा डालने के उद्देश्य से  बुनकर समाज का उत्पीडन किया जा रहा है | जो बेहद शर्मनाक है एवं सामाजिक न्याय की दुहाई देने वाली सरकार के दोगले चरित्र की ज़मानत देता है |

यहाँ एक तथ्य और ध्यान देने लायक है कि राज्य सरकार अनुसूचित जाति की तरह पिछड़ी जाति की सूची में भी संशोधन नहीं कर सकती | इस सम्बन्ध में उ०प्र० हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ का बेहद सख्त आदेश भी पिछले साल आया था कि राज्य सरकार पिछड़ी जातियों की संख्या बढाकर वोट बैंक की राजनीति कर रही है और अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण  कर रही है |  ये तथ्य समझ से परे है कि अनुसूचित जाति में कोई नई जाति शामिल करने की पहल बसपा क्यों  नहीं करती ? जब मछुआ समुदाय को दलित दर्ज़ा देने की बारी आई थी तो विरोध की कमान स्वयं मायावती जी ने संभाल ली थी |
क्या कोरी और हिन्दू जुलाहे दो पृथक जातियां हैं ?
अपनी पुस्तक ''The Tribes & Castes of Northern Western United Provinces & Oudh  '' , Vol 3-4 (1896) में सुप्रसिद्ध मानव शास्त्री  W.C. Crooke ने स्पष्ट उल्लिखित किया है कि " Kori is a Hindu Weaver . " 
 इस प्रकार कोरी हिन्दू जुलाहा है | जिसे सम्पूर्ण राज्य में कोरी, जुलाहा , हिन्दू जुलाहा, चंवर जुलाहा , कबीर पंथी जुलाहा , बुनकर कोली जुलाहा के उच्चारणों के साथ पुकारा जाता है |
इस उद्धरण के पश्चात कोई जांच, कोई टिप्पणी , कोई बहस मुबाहिसा और कोई शासनादेश  मायने नहीं रखता |
बहुजन समाज पार्टी के गठन में शेष दलितों के साथ साथ  कोरी भाइयों का भी अथक प्रयास रहा है  | इतना ही नहीं महात्मा गाँधी जी के साथ चाहे आज़ादी की लड़ाई हो या  स्व० कांसीराम जी के साथ सामाजिक न्याय की लड़ाई , कोरी जुलाहा बुनकर समाज ने अपना खासा योग दान दिया है और मजबूती के साथ अपना वोट बैंक थामे रख कर उसका फायदा बसपा को पिछले कई चुनावों में दिया है |
लेकिन अब लगता है कि शायद बहन जी को इनकी ज़रुरत नहीं रह गयी है ............


मंगलवार, 25 जनवरी 2011

वंचित जातियों का उत्थान - डॉ लोहिया का अधूरा सपना

                           "वंचित जातियों का उत्थान - डॉ लोहिया का अधूरा सपना"


प्रिय मित्रों,

लोकतंत्र में जनता का राज्य होता है | जनता अपने प्रतिनिधियों का चयन वोट द्वारा करती है | देश की आबादी का ८०% वंचितों का है परन्तु आज़ादी के ६० वर्षों के बाद भी दिल्ली की गद्दी पर वंचितों का राज्य नहीं हो पाया है | इसका कारण आर्येत्तर जातियों का छोटे छोटे वर्गों / जातियों में बँटे रहना है | अल्पसंख्यक द्विज जातियां इन आर्येत्तर जातियों को प्रागैतिहासिक काल से ही विभाजित रखकर शासन करने में सिद्धहस्त रही हैं | चुनावों में वे आज भी उन्हें जाति / धर्म के नाम पर बाँट कर तथा अपने वोट एकजुट रखकर सत्ता प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं | फिर सत्ता के ज़रिये अपने द्विज वर्ग का हित साधन करते हैं | इस प्रकार लोकतंत्र के बावजूद बहुसंख्यक निर्बल और अल्पसंख्यक सबल बन बैठता है |
वोट की ताक़त स्वतंत्रता के पश्चात महसूस की जाने लगी थी | पिछड़ों में मध्य वर्ग जागरूक होने लगा | पशु पालक जातियों यथा ग्वाल, अहीर, गोप, गोरा, घासी, मेहर, घोसी, कमरिया, कडेरी व यदुवंशी जातियों ने अपने को एकीकृत करके यादव नाम दिया | इसी तरह लोध, लोधा, लोष्ठ , लोष्ठा, लोधी,  मथुरिया लोधी राजपूत हो गए | कुर्मी ,चनऊ, पटेल, सैन्थ्वार कुर्मी कहे जाने लगे | चमारों की तो ५१ जातियों जिनमे पिप्पल, निम् , कर्दम, जैसल, जैसवार, जाटव, गहरवार, अहिरवार, जटिया, कुरील, रैदास, दोहर, दोहरे, डोहरा, रविदास, चमकाता, भगत चमकाता , रोहिदास, रोनिगर, रैगड़, भाम्बी, रोहित, खाल काढ, भगत चर्मकार , रैया, धोंसियार, डांबरे , उत्तराहा, दक्खिनाहा, नोना चमार , मोची , मूची, ऋषि, भैरवा, ढेड़, समगर , सागर, सगर, चम्बर, धुसिया और झुसिया ने अपने को केवल दो नामो चमार एवं जाटव से ही परिभाषित किया | इसी प्रकार व्यापार से जुड़े सूढी, हलवाई, रोनियार ,पंसारी, चौरसिया, मोदी, कसेरा, केशरी, ठठेरा, कलवार, सोनार, पतवार, कम्लापूरी वैश्य , सिंदूरिया बनिया, माहुरी वैश्य, अवध बनिया, वंगी वैश्य, वर्णवाल, अग्रहरी वैश्य (पोद्दार), कान्धू , कसौंधन वैश्य और  केसरवानी वैश्य जातियों ने स्वयं को बनिया के रूप में पिछड़ा वर्ग आयोग में पंजीकृत करा लिया तथा एक जगह वोट करने लगे हैं  और आपस में शादी विवाह करने लगे हैं|  इनकी उपस्थिति भी प्रदेश व राष्ट्रीय राजनीति में होने लगी है |
यादव राष्ट्रीय स्तर पर अन्य समकक्ष जातियों को अपने में जोड़ने हेतु प्रयत्नशील है | स्व० चौ० चरण सिंह ने अहीर ,जाट तथा  गुर्जर जातियों को जोड़ने का प्रयास किया था | परन्तु इसे तोड़ दिया गया | द्विज जातियों द्वारा पिछडो को पिछड़ा एवं अति पिछड़ा तथा दलितों को दलित एवं अति दलित में बांटने का प्रयास किया जा रहा है | जरूरत एकीकरण की है , विखंडीकरण की नहीं | परन्तु पिछडो में पीछे छूटे लोगों को आगे लाने की जिम्मेदारी विकसित पिछड़ों को ही निभानी होगी | किन्तु खेद जनक है कि अब वे भी द्विजवादी दृष्टिकोण अपनाने लगे हैं और अपने को नव द्विज के रूप में स्थापित करने लगे हैं | कमोवेश वंचितों के प्रति उनकी सोच भी द्विजों जैसी हो गई है |
"सोशलिस्ट ने बाँधी गाँठ, पिछड़ा पाए सौ में साठ" 
डॉ राम मनोहर लोहिया ने पिछड़ों की राजनैतिक, आर्थिक, एवं सामाजिक स्थिति का गहन अध्ययन किया | आपने इनकी समस्याओं पर बहुत गहराई से मनन एवं चिंतन किया | आपने पिछड़ों को संगठित करने तथा उनकी समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने में अग्रणी भूमिका निभाई | आपने सप्त क्रांति का सिद्धांत प्रतिपादित किया था | लोक नायक जय प्रकाश नारायण ने इसे सम्पूर्ण क्रांति का नाम दिया | आपने पिछडो के लिए ६०% आरक्षण की वकालत की |
आपके अनुयायी स्व० कर्पूरी ठाकुर ने सबसे पहले पिछड़ों को सरकारी सेवा में आरक्षण देने को अमली जामा पहनाया | देश की जनता ने सम्पूर्ण क्रांति के पुरोधाओं को सत्ता सौंप दी, परन्तु लोहिया के बाद सम्पूर्ण क्रांति का सपना आज भी अधूरा है | एक बार एक पत्रकार ने डॉ राम मनोहर लोहिया से कहा था कि एक समय आएगा जब मध्यवर्गीय पिछड़ा, अति पिछड़ा तथा दलितों का शोषण करेगा | तब क्या होगा ? डॉ लोहिया ने कहा था,  तब वंचित अन्य पिछड़ा वर्ग संगठित होगा और संख्या के आधार अपना हिस्सा लेगा | लगता है, वह समय अब आ गया है |
प्राचीन काल में वर्णवादी व्यवस्था में संगठित होने का तरीका रक्त सम्बन्ध रहा था | अन्तर्जातीय विवाह से वंचित खटिक, खतवे, गोढ़ी , गंगे ,गंगौत, गन्धर्व, खटवास, धींवर, चाई, चंद्रवंशी, तांती, तुरैहा, तियर, तियार, थारू, धानुक, नोनिया, कहार , नाई , नामशूद्र, प्रजापति, मांझी मझवार , बेलदार , बिन्द, बियार, भास्कर, माली, मल्लाह, मारकंडे, भोटियारी, राजधोब, राजभर, राजवंशी, किसान, लोध, केवट, खुल्वट तथा वनचर जातियां एक जगह संगठित हों तथा आपस में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करें | तभी वंचित समाज का कल्याण हो सकेगा | इनकी संख्या ३५-४० % है | परन्तु इनमे से कई जातियों का विधान सभा लोक सभा में प्रतिनिधित्व तक नहीं है | इनकी एकता व संगठित शक्ति का राष्ट्रीय एवं राज्य कि राजनीति में गहरा असर पड़ेगा |
समाजवादी समाज का निर्माण हमारा संवैधानिक उद्देश्य है, समता मूलक समाज हमारा लक्ष्य है | बिना जातिवाद को ख़त्म किये समाजवाद आना मुश्किल है | सरकार की जाति तोड़ो योजनायें निष्फल रही हैं | उल्टा जातिवाद को हर स्तर पर बढ़ावा दिया जा रहा है |
दलितों एवं पिछड़ों के आरक्षण का लाभ इनकी मध्यमवर्गीय कहे जाने वाली जातियों ने ही उठाया है | या यूँ कहें कि दूसरों को लेने नहीं दिया है  | और नतीजतन एक नये प्रकार का वर्ग आकार ले रहा है जो लोकतंत्र के बावजूद गुलाम है,  आरक्षण के बावजूद वंचित  है, सामाजिक न्याय के बावजूद पीड़ित है, बहुसंख्यक होने के बावजूद उपेक्षित है और समाजवाद के बावजूद शोषित है | यही वो वर्ग है जो प्रत्येक स्तर पर आज भी अंतिम पायेदान पर है |
आइये हम सब इस उजड़े, पिछड़े, दलित, शोषित, उत्पीडित, बहिष्कृत और वास्तव में वंचित कर दिए गए समाज के लिए संगठित होकर संघर्ष करने का संकल्प लें | 





बुधवार, 5 जनवरी 2011

!! गुर्जर आरक्षण - आवश्यकता या राजनीति !!

                                          
राजस्थान में गुर्जर आरक्षण की आग पुनः भड़क चुकी है | अनुसूचित जनजाति के आरक्षण कोटे की मांग को लेकर गुर्जर समुदाय फिर से आक्रोशित है | कडकडाती ठण्ड में गुर्जर दिल्ली-मुंबई रेलवे ट्रैक पर बैठे अपनी मांगे मनवाने की जद्दोजहद में हैं | सार्वजनिक संपत्ति को भी निशाना बनाया गया और जाम लगाकर राजमार्गों की रफ़्तार थामने का भी प्रयास किया गया | पुलिसिया संघर्ष में अनेकों घायल हुए तो कई फिर जेल गए | सरकार द्वारा फिर वार्ता की पेशकश की गई है | फिलहाल सभी वार्ताएं बेनतीजा साबित हुई हैं |
दरअसल मामला इतना सीधा नहीं हैं जितना सरकारें समझती आई हैं | गुर्जरों के समकक्ष राजस्थान में एक और जाति है मीणा | मीणाओं का खान पान ,रहन सहन ,संस्कार, मानव शास्त्रीय व्यव्हार, शैक्षिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति गुर्जरों से कदापि भिन्न नहीं है लेकिन इसी जनजातीय आरक्षण के बूते मीणाओं का न केवल राजस्थान सरकार में अच्छा दबदबा है बल्कि सरकारी योजनाओं का संचालन करने वाले राजस्थान के प्रशासन में मीणाओं की खासी भरमार है | इतना ही नहीं जनजातीय कोटे पर अपनी बादशाहत की बदौलत मीणाओं ने केन्द्रीय सेवाओं के उच्च पदों पर भी अपना झंडा गाड़ रखा है | केवल जनजातीय आरक्षण की बदौलत आई इस यकायक क्रांति की चमक ने गुर्जरों को चौंधिया कर रख दिया | सामाजिक ताने बाने में परस्पर बुने और आपस में गुंथे दो समकक्षीय समुदायों की विकासात्मक प्रक्रिया इतनी विभेद पूर्ण होगी कि एक मलाई खाए और दूसरे के हाथ खाली बर्तन तक न आये, ये गुर्जरों ने सोचा भी न था | संवैधानिक व्यवस्था ही निसंदेह कहीं न कहीं दोषपूर्ण है |
डॉ. लोहिया ने कहा था -" समाजवादी विचारधारा की सामाजिक सहिष्णुता ही पोषक है " | और यही समाजवाद  आज हमारे संविधान की आत्मा है | जब समाज से सहिष्णुता ही गायब हो जाएगी तो काहे का समाजवाद और कैसी संवैधानिक व्यवस्था ? गुर्जरों के आरक्षण का सर्वाधिक विरोध मीणा समाज द्वारा किया जाता रहा है | इसके पीछे मजेदार तर्क ये दिया जाता है कि गुर्जर अनूसूचित जनजाति के मानक पूरे नहीं करते | जब कि गुर्जर समुदाय जम्मू कश्मीर ,हिमाचल प्रदेश , उत्तराखंड व पंजाब सहित कई राज्यों में अनुसूचित जनजाति के रूप में घोषित है | इतना ही नहीं तत्कालीन  केद्रीय वन मंत्री श्री नमो नारायण मीणा द्वारा गुर्जर आरक्षण का यह कर विरोध किया गया कि अगर गुर्जरों को जनजातीय आरक्षण दिया गया तो मीणा समाज प्रदेश सरकार को सबक सिखाएगा क्योकि ऐसा करने से मीणाओं का कोटा कम हो जायेगा | ऐसी घटिया सोच एक केन्द्रीय मंत्री जैसे जिम्मेदार ओहदे पर बैठा शख्स रखता है तो आम मीणा का नजरिया सोचा जा सकता है |
यही असहिष्णुता समाज में वैमनस्य का कारण बनती जा रही है जो समाजवादी व्यवस्था के लिए न केवल खतरे की घंटी है बल्कि समाज के उन कमज़ोर और उपेक्षित वर्गों के लिए चुनौती भी है जो आरक्षण के सहारे राष्ट्र की मुख्य धारा में आना चाहते हैं और शिक्षा एवं विकास के ज़रिये अपनी आजीविका में सुधार लाना चाहते हैं | अब आरक्षण कोई नया प्रयोग तो है नहीं, ना ही ये किसी ख़ास जाति या समाज की संपत्ति ,बपौती या जायदाद है जो एक ही समाज इसका फायदा ले और दूसरे यदि इस की मांग करें तो उन्हें नियम कानून पढ़ा कर टरका दिया जाये | दुनिया के १२० से ज्यादा मुल्कों में किसी न किसी रूप में आरक्षण लागू है |  बहुसंख्यक दलित या पिछड़ों के सामने अल्पसंख्यक दलितों या पिछड़ों की उपेक्षा सरकारों के लिए अच्छा संकेत नहीं है | बहुसंख्यक दलित यदि ये सोचते हैं कि किसी अन्य जाति द्वारा कोटे में शामिल हो जाने से उनकी जाति का हिस्सा कम हो जायेगा तो ये बात आपने पैरों में कुल्हाड़ी मारने जैसी होगी क्योंकि आरक्षण से सबसे ज्यादा किसी का कोटा कम हुआ है तो सवर्णों का | अब दलित/पिछड़े  खुद किसी समाज के आरक्षण का  किस अधिकार से विरोध कर सकते हैं | और यदि दलित / पिछड़े ही एक दूसरे के आरक्षण का विरोध बंद नहीं करेंगे तो निश्चित ही एक दिन आरक्षण ख़त्म कर दिया जायेगा | वैसे भी यह व्यवस्था नितांत तात्कालिक एवं समीक्षात्मक है |  बाबा साहेब डा० अम्बेडकर की आरक्षण परिकल्पना सम्पूर्ण दलित समुदाय के लिए थी न कि दो -चार जातियों के विकास के लिए |
कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के नेतृत्व  में २३ मई २००८ को आरम्भ हुए इस आरक्षण आन्दोलन में जमकर सियासत भी हुयी | राजस्थान की तत्कालीन भाजपा सरकार में मंत्री श्री कालू लाल गुर्जर एवं विधायक प्रहलाद गुंजल ने आन्दोलन को सरकार के इशारे पर बाँट दिया | बँटे हुए गुर्जरों की अब मांगे भी अलग हो चुकी थीं | आधे गुर्जर अब जनजातीय कोटे की मांग छोड़ कर, मीणाओं के दबाब में आई वसुंधरा सरकार की पेशकश विशेष पिछड़ा वर्ग आरक्षण कोटा लेने को तैयार हो गए | जब कि इसी पिछड़े वर्ग की आरक्षण सूची में गुर्जर ३० सालों से हैं | किन्तु २००१ में पिछड़े वर्ग में जाटों के शामिल हो जाने से गुर्जरों के लिए बची खुची गुंजाइश भी जाती रही | २००४ के लोकसभा चुनाव से ऐन पहले तत्कालीन बाजपेयी सरकार द्वारा गुर्जरों को जनजातीय दर्ज़ा देने का ऐलान भी किया गया था वो भी जयपुर जाकर | केन्द्र से भाजपा के सफाये के बाद गुर्जरों की  प्रदेश  भाजपा सरकार से ही आस बची थी | ये बात भी सच है कि गुर्जरों का विकास अनुसूचित जनजाति आरक्षण दिये बिना संभव  नहीं है और वे इसके मानक भी पूरे करते हैं | किन्तु उनकी ये मांग जयपुर व नई दिल्ली से हर दफा खारिज कर दी गई | फलस्वरूप आन्दोलन की परिणिति हुयी|
इधर बैंसला के लोकसभा चुनाव लड़ने व करारी हार ने आन्दोलन को पूरी तरह राजनैतिक व धड़ेबाजी में बाँट दिया | हालांकि  पूरे मामले में सचिन पायलट की चुप्पी रहस्यमय रही और उनकी सक्रियता भी उनके निर्वाचन क्षेत्र तक ही रही | यदि सचिन पायलट चाहते तो प्रदेश की गहलौत सरकार पर दबाब बना कर केंद्र सरकार को जनजातीय आरक्षण का प्रस्ताव भिजवा सकते थे और वहां से इसे मंज़ूरी भी दिला सकते थे लेकिन मीणा वोटों का कांग्रेस से छिटक जाने का डर भी था | अब लब्बोलुआब ये है कि बैंसला किसी भी सूरत कोई राह निकालना चाहते हैं ताकि बात रह जाये लेकिन धड़ेबाजी में बटें आन्दोलन और बिखरे हुए गुर्जरों की फिलहाल बात बनती नज़र नहीं आ रही |

 कहाँ तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए |
 कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए ||

रविवार, 2 जनवरी 2011

नव वर्ष हो मुबारक !!

सभी सजातीय बंधुओं को नए वर्ष की शुभ कामनाएं | आप जानते ही हैं चुनौतियों से लड़ते लड़ते फिर एक साल होने को आया है | हालात मुश्किलों भरे हैं | माहौल पेचीदा है| संभावनाएं शून्य हैं | उम्मीदें कमज़ोर हैं | नेतृत्व मूकदर्शी है | संगठन नाममात्र है | सरकार संवेदनहीन है | नीतियाँ पक्षपाती हैं | अधिकारी बहरे हैं | समाज लाचार है | लेकिन फैसला अब भी बाक़ी है और ज़रूरी भी |

अब बदलाव ही एक मात्र विकल्प है | आइये नए साल में शपथ लें कि समाज विरोधी ताक़तों का डट कर मुकाबला करेंगे, अन्याय और  भाई-भतीजाबाद की नीतियों पर चलने वाली एवं  बहुसंख्यक दलितों के सामने अल्पसंख्यक दलितों की उपेक्षा करने वाली इस आताताई सरकार को बदलेंगे और बदलाव लायेंगे  |

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

इसी लिए कोहराम मचा है !!

इसी लिए कोहराम मचा है !!
करता तू इनकार रहा है ,
जो इनका अधिकार रहा है |
इसी लिए कोहराम मचा है !!

स्वर्ग तुम्हारा टूट रहा है , 
भर्म तुम्हारा छूट रहा है ,
बिन वेतन का दास तुम्हारा ,
चंगुल से अब छूट रहा है |
इसी लिए कोहराम मचा है !!

जिनको अब तक लूट रहा था ,
सांकल से वह छूट रहा है ,
ईश्वर का आडम्बर तेरा ,
मातम का वह फंदा तेरा ,
पुनर्जन्म का धंधा तेरा ,
स्वर्ग-नरक का चंदा तेरा,
वर्ण-व्यवस्था गन्दा तेरा ,
सब कुछ तो अब टूट रहा है |
इसी लिए कोहराम मचा है !!

पोथी और पुथन्नों को तू ,
गढ़ने का मक्कार रहा है ,
बैठे-ठाले  खाने वाला ,
चालू व हुशियार रहा है ,
रटा रटाया , लिखा लिखाया ,
विद्याओं को छिपा छिपाया ,
पर हमने भी छेद किया है ,
हमने उनको जान लिया है ,
हमने उनको छान लिया है ,
शोषण के सब हथकंडे है ,
परत-परत संज्ञान लिया है |
इसी लिए कोहराम मचा है !!

{साभार -  दलित साहित्य -श्री गुरु प्रसाद मदन की श्रेष्ठ कविताएँ  }

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

" अम्बेडकर - शोषितों और दलितों के मसीहा "

" इस दुनिया में आत्मसम्मान से जीना सीखो | दुनिया में कुछ करके दिखाने के लिए आपको अपने लक्ष्य निर्धारित करने होंगे | संघर्ष करने वाला अकेला ही चल पड़ता है | हो सकता है कि इस बीमार व्यवस्था को सुधारने वाले का कहीं जिक्र भी न हो ,लेकिन अब लाचारी और बेबसी के युग का अंत हो गया है और नया वक़्त शुरू हुआ है | आपके राजनीति में आने और कानून बनाने की ताक़त हासिल कर लेने के बाद कुछ भी असंभव नहीं रहेगा |"

डा० भीमराव रामजी अम्बेडकर , भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष चुने गए और आपका सबसे बड़ा योगदान मौलिक अधिकारों के साथ साथ राज्य को दिए गए नीति निर्देशक सिद्धांत रहे , जिसकी वज़ह से हमें स्वतन्त्रता, समानता और अस्पर्शता से छुटकारा मिला | आपने सम्पूर्ण जीवन भर भारतीय जातीय व्यवस्था में व्याप्त अस्पर्शता के विरुद्ध संघर्ष किया | भारत में दलित बौद्ध आन्दोलन का श्रेय भी आपको ही जाता है |

14 अप्रैल १८९१ को महाराष्ट्र की अस्पर्श कही जाने वाली "महार" जाति में जन्म लेने वाले डा० भीम राव अम्बेडकर ने , जो कि प्रसिद्द न्यायविद ,  दलितों के सशक्त नेता , बौद्ध नवजागरण के सूत्रधार और भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पी भी थे , जीवन में अनेक बार सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयों का सामना किया था | आपको विद्यालय में कोने में बैठने को मजबूर किया जाता था और मास्टर आपकी  पुस्तकें तक नहीं छूते थे | इसी क्रूरता और भेदभाव से लड़ते लड़ते १९०८ में आपने मैट्रिक पास किया |  इसके पश्चात आपने बम्बई यूनिवर्सिटी से राजनैतिक विज्ञानं और अर्थशात्र में स्नातक परीक्षा पास की | १९१३ में आपने इग्लैण्ड और अमेरिका के विश्वविद्ध्यालयों से कानून में परास्नातक के साथ साथ राजनैतिक विज्ञान और अर्थशास्त्र में शोध करते हुए डाक्टरेट की उपाधियाँ भी प्राप्त कीं |

भारत लौट कर आपने पाक्षिक समाचार पत्र "मूक नायक" आरम्भ किया तथा अस्पर्शता के विरुद्ध पूरे भारत में सभाएं कीं | १९१९ में लन्दन में भारतीय स्वतन्त्रता की तैयारी को लेकर आयोजित सम्मलेन में  अंग्रेज सरकार के आमंत्री की हैसियत से आपने दलितों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की ज़ोरदार वकालत की | शोषित वर्गों के शैक्षिक एवं सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिए आपने बहिष्कृत हितकारिणी सभा का गठन किया | आप बम्बई विधान परिषद् के सदस्य रहे और अस्पर्शता के विरुद्ध आपने कई सक्रिय आन्दोलन चलाये | अछूतों के अधिकारों को लेकर आपने महाड के आन्दोलन का भी नेतृत्व किया |

मुख्य राजनैतिक दलों द्वारा जाति प्रथा को महत्त्व दिए जाने से अम्बेडकर प्राय: उनकी आलोचना करते थे | आप अछूतों के पृथक निर्वाचक मंडलों के पक्षधर रहे और इसी कारण महात्मा गांधी से आपका विरोध रहा | गांधी को डर था कि इस विभाजन से आगामी पीढ़ियों के लिए हिन्दू समाज बँट जायेगा | आखिरकार लम्बी ज़द्दोजहद  के बाद २४/९/१९३२ को पूना पैक्ट हुआ |

नासिक के निकट येओला कांफ्रेंस में भाषण देते समय आपने बौद्ध धर्म अपनाने की इच्छा व्यक्त की क्योंकि इसमें जातीय व्यवस्था नहीं होती | आपने बौद्ध धर्म अपना कर पूरे भारत का भ्रमण किया | १९५५ में आपने भारतीय बौद्ध महासभा का गठन किया तथा १९५६ में "बुद्ध और उनका धर्म" पर अपना कार्य पूर्ण किया | एक औपचारिक जन समारोह में आपने ५,००,००० अनुयाईयों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण की और हिन्दू धर्म व हिन्दू दर्शन को नकारते व त्यागते हुए बौद्ध धर्म की २२ प्रतिज्ञाएं लीं |

१९३६ में आपने स्वतंत्र लेबर पार्टी का गठन किया और मध्य विधान सभा में १५ सीटें जीत लीं | आपने कांग्रेस द्वारा अछूतों को हरिजन कहे जाने पर सख्त ऐतराज़ जताया | आपने अनेक पुस्तकों की रचना की जिनमे प्रमुखत: "जातीय उन्मूलन", "पाकिस्तान पर विचार", "कांग्रेस और गाँधी ने अछूतों के लिए क्या किया ?", "शूद्र कौन हैं ?", और "अछूत - अस्पर्शता के उदगम पर शोध " हैं |

आज़ादी के बाद अम्बेडकर को देश का प्रथम कानून मंत्री और संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया | आपने बुद्ध संघीय आत्मा को भारतीय और पाश्चात्य विचारों के साथ समावेशित करते हुए संविधान को मूर्त स्वरुप प्रदान किया | आपने कमजोरों, दबे-कुचलों और विशेषत: महिलाओं के लिए संविधान में ख़ास प्रावधान किये | 

आपने १९५१ में कैबिनेट से हिन्दू कोड बिल के विरोध में इस्तीफ़ा इसलिए दे दिया क्योंकि आप संसद में लिंगीय आधार पर समान विरासत, समान वैवाहिक नियम और समान अर्थव्यवस्था का कानून चाहते थे | बाद में आप राज्य सभा में चुने गए और अपनी मृत्यु ६ दिसंबर १९५६ तक आजीवन सांसद रहे |

दलितों के धर्म युद्ध हेतु आप आने वाली पीढ़ियों के लिए एक परम शक्तिशाली हथियार सौंप कर गए | आरक्षण के प्रावधान का उपयोग करके अनेक दलित शिक्षित हो गए और अपनी आजीविका में सुधार ले आये | आपकी प्रेरणा आज मानवाधिकारों में भी परिलक्षित हो रही है | आज हमें अनेक दलित राजनैतिक दल , दलित प्रकाशक, और दलित कर्मचारी संगठन आपके प्रयासों से ही नज़र आ रहे हैं | इस प्रेरणा को गंभीरतापूर्वक आगे ले जाने की आवश्यकता है | दलित एजेंडा अग्रसर रहे, इसका दायित्व हमें ही उठाना होगा | जातीय व्यवस्था ने भारतीय समाज को आज भी नहीं छोड़ा है | हम आज भी अस्पर्शता का शिकार हो रहे हैं | जब दलित सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त हो जायेंगे, तभी बाबा साहेब डा० अम्बेडकर का सपना पूरा होगा |

बाबा साहेब डा० अम्बेडकर ने कहा था " मेरी अंतिम सलाह यही है कि आप शिक्षित बनो, जागरूक हो, संगठित रहो और अपने आप पर भरोसा रखो | यह युद्ध पूर्ण अर्थों में आध्यात्मिक है, इसमें सांसारिकता व भौतिकता की चाह नहीं होगी | ये मानवीय आस्तित्व के पुनरुद्धार की लड़ाई  है |  "

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

|| आरती भगवान श्री कालू देव ||

                          "तुरैहा समाज के इष्ट पुरुष - भगवान श्री कालू देव "


ओउम जय कालू देवा, प्रभु जय कालू देवा |  
नारद तुम गुण गावें, इन्द्र करें सेवा || ओउम जय....

तुम तुराये गढ़ स्वामी , बलिया वंश पति |
सोलह सिंह की सेना , तुमरे द्वार बंधी || ओउम जय....

नाप लिए दस पग में ,  तुम कंचन जंघा |
तुमरे तेज के आगे , हार गयी गंगा || ओउम जय .....

इन्द्र तुम्हें गुरु माने , चरण धोय पीता |
तुम रक्षक हम सबके , तुम जग जल जीता || ओउम जय ....

क्रोधित होकर वासुकि , तुम पर फुंफकारे |
विष की भीषण ज्वाला , तन पड़ गए कारे || ओउम जय ....

हाल सुना तब चन्दन , हरि दौड़े लाये |
तब से तुम देवों में , कालू कहलाये || ओउम जय ....

पूरण होवें कारज , जो तुम को ध्यावें |
तुमरे भजन तुरैहा , प्रेम सहित गावें || ओउम जय ....

श्री कालू जी की आरती , जो कोई नर गावे |
कहत मछिंदर बाबा , वो नर तर जावे || ओउम जय ....

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

" बिखरी हुई ताक़त "

हम लोग शिकवा- शिकायतें ही करते रह गए और दूसरे अपना काम निकलवा कर ले गए | हम साधनों की कमी का ही रोना रोते रहे और दूसरे सत्ता व शासन में अपनी पकड़ बनाते चले गए | उन्होंने अपनी जातीय पहचान को बढाया और संगठन बना कर अपने वोटों को एक जुट करके राजनैतिक शक्ति हासिल करते हुए सरकार का हिस्सा बन बैठे , जब कि हम न तो साधनों में पीछे थे, न संख्याबल में | न अनुभवहीन ही थे और न ही मृतप्राय , फिर भी हमें कोई राजनैतिक दल  गिनने को तैयार नहीं, शक्ति के रूप में जानना और हमसे डरना तो दूर की कौड़ी रही | कारण स्पष्ट हैं- बिखरी हुई ताक़त, लुप्तप्राय् मान- सम्मान और राजनैतिक इच्छाशक्ति का घोर अभाव |  इसलिए बिखरे और बँटे हुए लोगों से किसे और कैसा भय ?
अपनी आबादी पर यदि हम गौर करें तो पश्चिमी उत्तरप्रदेश की करीब ९० विधानसभा सीटों पर हमारा वोट है | प्रत्येक सीट पर कम से कम दस हज़ार से लेकर एक लाख तक तुरैहा मछुआरा वोट है| मध्य यूपी में अपने और अन्य मछुआरा उपजातियों की बदौलत हम ४० सीटों पर, पूर्वांचल की ८० सीटों पर , बुंदेलखंड की मछुआ व् नाविक जातियां  ४० सीटों पर  एवं ब्रजक्षेत्र की ५० सीटों पर तुरैहा समाज अपने अन्य सजातीय वोटों की ताक़त पर निर्णायक की भूमिका में है| इस तरह पूरे उत्तरप्रदेश की ३०० विधानसभा क्षेत्रों में हमारी हैसियत महत्वपूर्ण है| यह आंकड़ा सरकार बनाने और गिराने के लिए पर्याप्त है| इस संख्याबल से हमारा समाज भारी उलटफेर कर सकता है| या कम से कम इतना तो किया ही जा सकता है कि जो दल हमारी मांगों पर विचार न करे, उसे हरा दें, हटा दें |  
लेकिन ये आंकड़ा सिर्फ कागज़ी ही है, हकीकत से कोसों दूर | एक नेता और एक नियत एक अभाव में हमारे सभी प्रयास अँधेरे में तीर चलाने जैसे हैं |७ जातियों और ४३ उपजातियों में बँटा यह समाज अपना एक सर्वमान्य संगठन तक नहीं बना पाया है , एक नेतृत्व की तो बात ही छोड़ दीजिये | अब नेतृत्व के अभाव में कैसे संघर्ष किया जाए, किन मुद्दों को उठाया जाए और किस प्रकार अपनी बात सरकार में बैठे संवेदनहीन और सरोकार से दूर रहने वाले लोगों तक पहुंचाई जाए , ये बड़ा विचारणीय प्रश्न है | ये ज्वलंत बिंदु हैं, ये पहेलियाँ हैं और मुंहबांये खड़े सवाल हैं समाज के नौजवानों के लिए, और चुनौतियाँ  हैं समाज के हर उस व्यक्ति के लिए, जो अपनी जाति से ज़रा सा भी लगाव रखता है|  अपनी बिखरी ताक़त को सहेजना होगा| अपना सोया स्वाभिमान जगाना होगा| अपनी बात के लिए मरना सीखना होगा| अपने विकास के लिए दूसरों का मुंह ताकना बंद करना होगा| अपने संगठन से अपनी ताक़त खुद बनानी होगी | इसके लिए अपने मतभेद भुलाने होंगे| आपसी वैमनस्य को भूलकर भाईचारे की भावना को विकसित करना होगा| अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए समाज की एकता को दांव पर लगाने वाले जयचंदों की शिनाख्त कर उन्हें समाज से धकियाना होगा| समाज का हित सोचने वालों को ढूंढ ढूंढ कर आगे लाना होगा, निश्चय ही ये ही वो भागीरथ होंगे, जो समाज में क्रान्ति की गंगा ले आयेंगे | इसके लिए हमें इंतज़ार नहीं, शुरुआत करना होगी क्योंकि २०१२ अब ज्यादा दूर नहीं है | 

"वो मुतमईन है , पत्थर पिघल नहीं सकता |  
 मैं बेक़रार हूँ , आवाज़ में असर के लिए ||

सोमवार, 29 नवंबर 2010

" नया सवेरा "

आज़ादी मिले 63 साल हो गए, लेकिन आज भी हमारा तुरैहा समाज वहीँ का वहीँ पड़ा, अपनी बदहाली पर रो रहा है | देश की तमाम जातियां आज हर क्षेत्र में विकसित हो गयी हैं किन्तु हम किसी भी दिशा में आगे नहीं बढ पाए | समाज के बच्चे ज्यों ही कुछ समझदार होने लगते हैं , उन्हें घर वाले किसी न किसी काम में लगा देते हैं | लड़कियों की शिक्षा के बारे में बात करिए,तो जबाब मिलेगा कि हमें कौन सी नौकरी करवानी है ? शिक्षा के अभाव में लोगों को ये तक पता नहीं है कि देश में हो क्या रहा है और उन्हें क्या करना चाहिए ?

रविवार, 28 नवंबर 2010

" सबक सीखे कांग्रेस "

हाल ही में हुऐ  बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार ने साबित किया है कि झूठ, फरेब , अय्यारी, मक्कारी और बदले की भावना से की जाने वाली राजनीति का यही हश्र होता है | केंद्र की सरकार यह सोचे कि कोरी घोषणाओं की बदौलत लोगों को फुसलाकर सरकार बनालेगी तो ये स्वप्न फिलहाल टूटता ही नज़र आया | कांग्रेस २००३ से मछुआ समुदाय को छलती चली आ रही है | १६ पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों का दर्ज़ा देने सम्बन्धी प्रस्ताव को कांग्रेस ही लटकाए बैठी रही| जब कि मुलायम सिंह जी की सरकार में उक्त प्रस्ताव चार दफे केंद्र को संस्तुति सहित भेजा गया | मायावती जी ने तो हद ही कर दी , सरकार बनाने के २२ दिनों के भीतर मूल प्रस्ताव वापस मंगाकर निरस्त करवा दिया , जैसे बहन जी इसी मुद्दे पर जीत कर आयीं हों |  जब समाज ने दबाब बनाया तो महज २ पन्नो की चिठ्ठी केंद्र को भेजकर बसपा ने पिंड छुढ़ा लिया और गेंद फिर से  केंद्र के पाले में डाल दी | हमें फ़ुटबाल समझ कर इन लोगों ने अपने गोल मारे और जीतने पर अपनी फ़तेह का जश्न  मनाने चले गए , हमारी खाली गेंदे मैदान में अपनी तकदीर बदलने वाले  मसीहा की अब तलक मुन्तजिर  रही हैं |

शनिवार, 27 नवंबर 2010

" कल की सोचें "

कल की सोचें , कल का निर्णय आज ही लेना होगा| क्योकि आने वाला कल बेहद मुश्किलों भरा और संघर्ष पूर्ण होगा| यदि हमने अपने ऐशो आराम छोड़कर आने वाले समाज की चिंता नहीं की तो आने वाली नस्लें हमें बुरा कहती नज़र आएँगी| शिक्षित समाज ही विकास कर सकता है,इसके लिए आवश्यक है कि हम जागरूकता लाये और अपने खर्चो मे कटोती करके अपने बच्चो को शिक्षा दिलाये साथ ही समाज का संगठन बनाकर उसमे अपने योगदान सुनिश्चित करे

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

" अपनी मदद खुद करें "

अब वक़्त आ गया है , समाज अपना निर्णय खुद ले | अपने विकास के लिए सरकारी योजनाओं का मुंह ताकना बंद करना होगा | सरकारें भी समाजों की ताक़त और मूड देखकर अपने पत्ते खोलती रही हैं.| इसलिए आवश्यक है कि अपने आप को संगठित करके अपनी एकता कायम रखें और बच्चों की शिक्षा व संस्कारों  पर ध्यान दें| यदि हमारे पढ़े  लिखे नौजवान , समाज के धनवान व्यक्ति एवं ऊंचे ओहदों पर बैठे साधन संपन्न लोग ही समाज की समस्याओं की तरफ से आँखें मूंदे बैठे रहेंगे तो बिरादरी का भला करने या आवाज़ उठाने कोई बनिया -बामन तो आएगा  नहीं ? और अगर आएगा भी तो अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर हमें धोखा ही देगा | हम लोग हमेशा पिछलग्गू बनकर ही जीतें आये हैं , कभी आगे बढ़ कर नहीं देखा | कभी किसी भाई को मौका मिला भी तो अपने ही सबसे पहले उसकी टांगें खींचते नज़र आये | आपसी कलह और वैमनस्य हमारे तुरैहा समाज का दुश्मन बना हुआ है | जबकि हम मायावती या मुलायम सिंह को दोष देते रहे हैं |                                    
"ये और बात सफीना डूबा लिया मैंने ,                                                 
मगर खुदा न कहा तुझको नाखुदा मैंने "

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

"जागो तुरैहा बंधुओं "

Priye Turaiha Bhaiyo, Ab samay aa gaya hai ki hum aalasy tyag kar samaj hit ka chintan karein. Yadi educated log hi ghar baith jayeinge toh samaj ko disha kaun dega ? Aaiye miljul kar samaj ki problems pe dyan dein aur samaj ko naye siray se taiyyar karein. Educated, United and Organised people Can servive"