रविवार, 14 जुलाई 2013

हमारे युवा कब महसूस करेंगे ?

पुरातात्विक विश्लेषकों के अभिमतों की विवेचना कर मछुआ समुदाय का इतिहास लोगों के सामने रखों तो असलियत स्वीकारने में हिचकते है ...कहते हैं हम तो राजपूत थे । इतिहासकारों के सौ डेढ़ सौ साल पुराने तथ्यों का उल्लेख कर भारत की आदि निवासी मछुआ जाति पर कुछ लिखो तो कहते हैं .... हमारे दादे परदादे क्या थे ...हमें नहीं पता ....हम कश्यप हैं और महर्षि कश्यप की संतान हैं । हमारी साठ हजार परदादियाँ थी । धीवर, कहार, केवट ,मल्लाह के नाम से चिढने वाला समाज आज अपनी असलियत को भूल आधुनिकता की तथाकथित चादर तान सो जाना चाहता हैं । युवा कहते हैं ..हमें आरक्षण की क्या जरूरत हैं ..हम अपनी मेहनत से ही सब कुछ पाना चाहते हैं । आरक्षण तो भंगी और चमार या उनके समकक्ष होने की पहचान है । ज्यादा कहो ..तो कहते हैं ....हमें OBC का आरक्षण मिल तो रहा है ...क्या परेशानी है ?
विरोध नहीं करने की आदत ने हमारे अन्दर ही हमारे शत्रु पैदा कर दिए है ...जो विरोध करने वाले के पीछे लग जाते हैं और आपस में टांग खींच कर खुश होते हैं । सरकारें मनगढ़ंत निर्णय कर हमें और नुक्सान पहुंचा रही हैं ...हम एकता का ही रोना रोते रहे ।
वस्तुतः निषाद, केवट ,मांझी ,  मल्लाह , नाखुदा , जहाजी , एक ही शब्द हैं, लिहाजा एक जाति हैं । जबकि वास्तव में ये शब्द भाषाई एतबार से अलग है । निषाद संस्कृत का शब्द है ..जबकि केवट और मांझी उसी के हिंदी रूपांतर हैं ..इसी प्रकार मल्लाह उर्दू का शब्द हैं जबकि नाखुदा और जहाजी इसी के फारसी रूपान्तर है । इसी को अंग्रेजी में बोटमैन या फैरीमैन कहते हैं तो क्या एक ही अर्थ वाले सभी शब्द अलग अलग हो गए ? और अलग अलग जाति या प्रकार हो गये ... बिखरते गये ।
इसी प्रकार कहार शब्द उर्दू है जो कुलीगिरी काम काम करने वालों के लिए प्रयुक्त किया जाता था ..जिसे अमीरों ने पालकियों के वाहकों से जोड़ दिया । वास्तव में ये भी संस्कृत के स्कंधकार से बना हैं । इसी प्रकार धीवर धैवर्त से उद्धरत ..तत्पश्चात धीमर ,झीमर झिम्मर चिम्मड़ के रूप में अपभ्रंशित हैं । सरकारों में बैठे आठवाँ पास बाबू इन्हें अलग अलग मान कर क्रम संख्याएं बाँट रहे हैं ....और नित नई व्याख्याएं पेशकर रहे हैं । समाज बंटा जा रहा हैं .....हमारे लोग अपना अतीत राजवंशों और रजवाड़ों में तलाशते घूम रहे हैं । 

मेरे सामने टीवी पर मोदी का पुणे के फर्ग्युसन कालेज में दिया व्याख्यान लाइव चल रहा है ...चीन का भय दिखा कर ही सही ......मोदी जी लोगों को एक जुट करने का आह्वान कर रहे हैं ...और इसमें युवाओं को महत्त्वपूर्ण बता रहे हैं ..विश्व व्यापार में भारत की ऐतिहासिकता और हमारी प्राचीन मरीन इंजीनियरिंग का हवाला  देकर मोदी भाई ताली बजवा रहे हैं ....पता नहीं हमारे युवा मछुआ समाज का गौरव और एकजुटता की आवश्यकता कब महसूस करेंगे ?

शनिवार, 13 जुलाई 2013

कांग्रेस सन सैतालिस से हमें ठग रही है !


क्या मछुआरों को उत्तर प्रदेश सरकार के प्रस्ताव पर SC आरक्षण मंजूर करते ही केंद्र सरकार गिर जायेगी .........श्री प्रकाश जायसवाल को इतना बड़ा झूठ बोलने तनिक भी शर्म नहीं आई ...और बेहयाई से मछुआ समुदाय को ब्लैक मेल करते हुए मंत्री जी पूर्ण बहुमत की सरकार हेतु वोट मांगते हुए कहते हैं कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाओ तो SC स्टेटस मिलेगा । अगर ये सच है कि मछुआरों को SC  आरक्षण देते ही केंद्र सरकार गिर जायेगी तो कांग्रेस के इस मंत्री को उन लोगों के नाम भी उजागर करने चाहिए जो मछुआ आरक्षण पर कांग्रेस सरकार का विरोध कर रहे हैं और सरकार गिराने की हैसियत में भी हैं । उनके नाम और चेहरे सामने आ जायेंगे तो मछुआ समुदाय को आरक्षण विरोधियों से जूते की चोट पर सड़कों पर निबटने में आसानी होगी ।
दरअसल कांग्रेस और उसके मंत्री फर्जी बात बोलने में और मछुआ जातियों को गुमराह करने में महारत रखते हैं और हमारे लोगों को बेवकूफ समझते हैं । ...वे भूल रहे हैं कांग्रेस ने इस देश में 54 साल राज किया है और सदैव मछुआरों को धोखा ही दिया हैं ।
गोंड ,तुरैहा खरवार , मझवार और बेलदार को SC रिजर्वेशन महज नाम भर के लिए दिया । 31 अगस्त 1952 को अपराधी जाति अधिनियम 1871 के विखंडन के उपरान्त जरायमपेशा के तमगे से आजाद हुयी धीमर, केवट ,मल्लाह बिंद जातियों को उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति में आज तक शामिल नहीं किया जबकि उसके साथ दर्ज रही भांतु , बाबरिया , बेडिया, नट , चिड़ीमार ,बहेलिया , साँसी सहारिया को तत्काल ही SC सूची में शामिल कर लिया गया । कांग्रेस हमेशा से ही मछुआ जातियों के प्रति अपना दुश्मन नजरिया प्रदर्शित करती आई हैं । वस्तुतः इसके पीछे कांग्रेस नीत तथाकथित आजादी की लड़ाई का श्रेय लेने की होड़ रही जिसमे मछुआ समुदाय की जातियों ने राष्ट्रवादी भावनाओं का प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस और गाँधी की चाटुकारिता करने से इनकार कर दिया था और उग्र दल के साथ रहे ...नेहरु ने हमेशा ही इन जातियों को समाज विरोधी माना और वे इन्हें मुख्यधारा से दूर रखने के हिमायती रहे .....
गाहे बगाहे कांग्रेस नेहरु गाँधी की उसी सड़ी गली परंपरा को कही न कहीं आज भी ढोने का प्रयास करती नजर आती हैं  ।

शनिवार, 6 जुलाई 2013

आप भी यहाँ से विलुप्त हो जाएँ .....।

 दुनिया के किसी शब्द कोष में मांझी ,मल्लाह और केवट की व्याख्या भिन्न नहीं है और सभी एक दुसरे के पर्यायवाची हैं । लेकिन हमारी सरकारें इन्हें अलग अलग मानती हैं । समाज कल्याण के एक बाबू चुटकुला सुनाते हुआ कहते हैं कि बाबू की मारी हलाल होती है । यानि बाबू जो चाहे कर सकता हैं ...लिख सकता हैं । यह देश और इसके अफसर बाबुओं की सलाह पर चलते हैं .......अफसर अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं करते , फंसने से डरते हैं न । बाबूजी कहते हैं ......हमारी मर्जी ...हम जैसी चाहें व्याख्या सचिवालय से निकालें ...जिले के अफसर उसकी पटरी बनाकर रेल दौड़ाते नजर आएंगे । हम Majhi को मजही लिखेंगे ......कोई हमारा क्या उखाड लेगा । हम माँझी और मजही का भेद दुनिया को सिखायेंगे ....कोई हमारा क्या कर लेगा ? हम अंग्रेजी में लिखे MAJHI शब्द का उच्चारण भूलकर भी माझी नहीं करेंगे ...जब भी लिखेंगे मजही लिखेंगे ? हमने परीक्षा पास की है ..कोई ऐसे तो थोड़े बैठ गए हैं इस कुर्सी पर ...संविधान की जनकारी है हमको । दुसरे बाबू पान की पीक थूकते हुए बोले ......केवट और मल्लाह अलग अलग है ....हम प्रमाणित कर सकते हैं । हम कहे कैसे ? तो बतियाने लगे ...केवट गरीब होता है सो अकेला नैया खेता हैं ...यानि उसकी नाव छोटी होती है ....इस प्रकार केवट एक इकाई है अतः मल्लाह से प्रथक हैं । जबकि मल्लाह समूह में काम करते हैं ...मल्लाहों पर बड़ी बड़ी नावें होती है जिसे दस बारह लोग खेते हैं । समूह में रहने के कारण ये लोग चोर उचक्कई भी खूब करते हैं ....नाव खरीदना आसान काम नहीं है ....जाहिर सी बात है मल्लाह पेशा करने वाली मल्लाह एक मालदार कौम हुयी । मांझी को कोई आरक्षण नहीं मिलेगा .......मिलेगा भी तो केवट वाला OBC का .......। मजही के आरक्षण से दूर रहो सालो।
हमने कहा तुम्हारा दिमाग खराब है । वो बोले आप MBBS डाक्टर होते तो आपका तर्क मान लिया जाता ...लेकिन आप सडकछाप हो ..सडक पर जाओ और चिल्लाओ ....।
हमने कहा तुमभी तो मोची हो .....चमार बने बैठे हो ....मोची जाति पिछड़ी जाति में आती है ...चाहे तो लिस्ट देख लो OBC की यूपी वाली । जब पिछड़ी जाति का मोची ...चमार कहलवा कर SC का आरक्षण झटक सकता है तो मल्लाह को मझवार क्यों नहीं माना जा सकता है ? वे बोले मझवार यूपी में नहीं पाए जाते ....हमने कहा तो कहाँ पाए जाते हैं .....? कहते हैं द्रविड़ियन कास्ट थी ....विलुप्त हो गयी ।
आप भी यहाँ से विलुप्त हो जाएँ .....। फिर चार पांच बाबू आस्तीने चढ़ाये ....मरने मारने का जज्बा लिए आ धमके ...मुझे शौचालय में घुस कर जान बचानी पड़ी ।

रविवार, 9 जून 2013

अंतर्विरोधी आरक्षी स्वाभाव

दैनिक जीवन में हम प्रायः देखते हैं कि किसी चलती रेलगाड़ी में कोई भागता हुआ आता है किसी डिब्बे में चढने का प्रयास करता है तो उस डिब्बे में पहले से मौजूद भीड़ उसे घुसने से रोकना चाहती है ,दरवाजे पर डिब्बे में घुसने से रोकने वालों में सबसे आगे हो जाता है ।
पहरेदार की तरह खड़े लोग रास्ता नहीं देते और कहते हैं .....कहाँ चढ़े चले आ रहे हो भाई ? देखते नहीं पहले से फुल हैं .....आदमी के ऊपर आदमी चढ़ा हुआ है ..कतई जगह नहीं है ...पीछे निकल जाओ ..पूरे पूरे डिब्बे खाली है । लेकिन वह व्यक्ति नहीं मानता है और आखिरकार चिरौरी कर जबरदस्ती घुसने में कामयाब हो जाता है ...फिर आगे चल कर उसे वहीँ सीट भी मिल जाती हैं । किन्तु आश्चर्य जनक से अगले स्टेशन से वह व्यक्ति भी डिब्बे में घुसने वालों का विरोध करने लगता है और

सार यह है ....हम स्वयं आरक्षण तो चाहते हैं लेकिन दूसरो के आरक्षण का विरोध करते हैं । सभी हिन्दू लोग ... दलित ईसाईयों और मुसलमानों के आरक्षण का विरोध करते हैं । सवर्ण हिन्दू .... दलितों और पिछड़ों के आरक्षण का विरोध करते हैं , जबकि इसके उलट वे स्वयं आर्थिक रूप से आरक्षित होना चाहते हैं । इसी प्रकार दलितों में साठ साल से आरक्षण का आनंद उठा रही एक दो जातियों किसी अन्य जाति को किसी भी कीमत पर नहीं घुसने देना चाहती । पिछड़ी जाति की ताकतवर जातियां ..अति पिछड़ों को अलग से कोई कोटा नहीं देना चाहती । दलितों पिछड़ों अल्पसंख्यकों के आरक्षण का विरोध करने करने वाली सवर्ण नारियां सबसे पहले महिला आरक्षण का लुत्फ़ चाहती हैं ...अर्थात जो स्वयं आरक्षित है या होना चाहता है वह दुसरे के आरक्षण पर विरोधी सुर निकालता है और उसे गैरवाजिब बताता है ।
मजेदार बात ये है कि अपने आरक्षण के समर्थन में और दुसरे के आरक्षण के विरोध में सबके अपने अपने दावे और प्रतिदावे हैं । अपने आरक्षण पर सबके सुर एक समान हैं ...कोई अंतर नहीं । एक सवर्ण दलितों के आरक्षण पर मुंह बिचका कर कहता है ....."सालों को सब कुछ फ्री में चाहिए , बिना मेरिट में आये नौकरी चाहते हैं "। आश्चर्य जनक रूप से सवर्ण की यही भाषा दलितों के आरक्षण का मजा ले रही मायावती की जाति के लोग ....उन वंचित और उपेक्षित दलितों से बोलते है जिन्हें आरक्षित सूची में होने के बाद भी साठ सालों से कुछ नहीं मिला .....यानि मेरिट राग ....शैक्षिक गायन ।

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

प्रश्न धीमी आंच पर सेके हुए हैं.....!!

झूठ का हम आवरण पहने हुए हैं ।
क्या करें ...हम जान कर बहरे हुए हैं ॥  
आर्थिक मुद्दों पे चिंतन कर रहे है ।
कौन कहता है कि वो लेटे हुए हैं ॥
सुर्ख़ियों में आई क्या दिल्ली की दहशत ।
गाँव के बच्चे भी अब सहमे हुए हैं ॥
आज महिला संगठन की है समीक्षा ।
आप सर्किट हाऊस में ठहरे हुए हैं ॥
रख दिए बच्चों ने खुद ही दाम सुनकर ।
अब खिलौने इस क़दर महंगे हुए हैं ॥
हम यहाँ बेजान सी मूरत के आगे ।
चंद सिक्कों की तरह फेंके हुए हैं  ॥
लाजमी है स्वाद मुद्दों में हमारे ।

प्रश्न धीमी आंच पर सेके हुए हैं ॥
आपका अनुरोध फिर से मान लेता ।
बंदिशें कुछ हैं, जो बस रोके हुए हैं ॥
बर्फ रिश्तों पर जमीं पिघली हुयी हैं । 

और वो भी आजकल बदले हुए हैं ॥

कापी राईट @अरुण कुमार तुरैहा

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

......जानते हैं

मसअले अहले हुकूमत जानते हैं ।
कौन क्या, किसकी है कीमत जानते हैं ॥
आप नाहक ही यहाँ चिल्ला रहे हो ।
चुप रहो !  सब माबदौलत जानते हैं 
आप माथे की शिकन को क्या पढेंगे ?
आप बस लिक्खी इबारत जानते हैं ॥
मुफलिसी को आप तोहमत दे रहे है ।
हम मगर इसकी हरारत जानते हैं ॥
मुझको तेरी आदतें बतला रहे हैं ।
तुझको जो मेरी बदौलत जानते हैं ॥ 
आज भी तनहा हूँ मैं, उनसे बिछुड़ कर ।
और वो मेरी शराफत जानते हैं ॥ 
आशनाई है मुसलसल रौशनी से  ।
हम अंधेरों की सियासत जानते हैं ॥
शौक से करिए शिकायत आप लोगो ।
हाकिमों की वो रवायत जानते हैं ॥ 
जुर्म करते हैं मगर फंसते नहीं हैं ।
वो तरीका ए अदालत जानते हैं ॥
आज हर लीडर को देते हैं भरोसा
लोग अब मौका नजाकत जानते हैं ॥

कापीराईट @ अरुण कुमार तुरैहा 

शनिवार, 23 मार्च 2013

आरक्षण का तात्पर्य गरीबी उन्मूलन कदापि नहीं

आरक्षण का वास्तविक  उद्देश्य अस्पर्श्य एवं शूद्र जातियों की मूल आजीविका में परिवर्तन लाते हुए सामाजिक एवं आर्थिक रूप से संपन्न बनाना हैं। यह एक संविधान सम्मत व्यवस्था है । यह शूद्रों को गाँधी अंबेडकर समझौते के तहत भारत में रहने का ईनाम हैं , शूद्रों को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने की गारंटी है और व्यवस्था में भागेदारी की शर्त है । निसंदेह आरक्षण ने अपनी उपयोगिता को दलितों के मध्य प्रमाणित किया है और पिछले 60 वर्षों में इसके सुखद और प्रत्याशित परिणाम भी परिलक्षित हुये हैं । आज भी आरक्षण उतना ही प्रासंगिक है जितना पचास वर्ष पूर्व था।  इसके बिना आज भी भारत की राज सत्ता और कार्यपालिका में शूद्रो का प्रतिनिधित्व असंभव है । सदियों से उपेक्षा और अपमान का दंश झेलने वाले वर्गों को वर्तमान आरक्षण व्यवस्था ने ही सर उठाकर ससम्मान जीवन जीने का अवसर प्रदान किया हैं ।
कुछ लोग इसे गरीबी मिटाने का उपाय बताते हुए इसे गरीबों को प्रदान करने की वकालत करते हैं । जबकि आरक्षण विशुद्ध रूप से भागेदारी है । यह भूखे लोगों के लिए नहीं है ......यह उपेक्षित, उत्पीडित ,वंचित ,शोषित और बहिष्कृत लोगों को राष्ट्र की मुख्य धारा में समाहित करने का एकमेव उपाय हैं ।  यह गरीबी मिटाने का नहीं बल्कि शासन और प्रशासन में भागेदारी दिलाने का एक मात्र जरिया हैं । यह सदियों से घोर जातिवादी अन्याय का शिकार लोगों के हित में राज्य की ऐसी व्यवस्था है जिसका लक्ष्य उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करते हुए सामाजिक स्तर पर बराबरी प्रदान करना हैं ।
गरीबी उन्मूलन का कोई भी कार्यक्रम आरक्षण का मुकाबला कदापि नहीं कर सकता । इसमें आर्थिक रूप से संरंक्षण देते हुए छुआछुत की भावना को मिटाने की संकल्पना सन्निहित हैं ।  वास्तव में जो लोग इसे गरीबी मिटाने का जरिया बनाकर पेशकरना चाहते हैं वे असल में इसके स्वरुप को बदलकर समाप्त कर देना चाहते हैं। सवर्ण को किसी भी रूप में मिला संरक्षण उसके जातीय दंभ को ही विस्तार प्रदान करेगा और जातपांत की खाई को और चौड़ा करेगा ।

मैं राहुल से बात करूंगा !!

मैं राहुल से बात करूंगा, दिल्ली के चौराहों पर ।
मछुआ घर से निकल पड़ा हैं, चलने को अंगारों पर ॥

आरक्षण अधिकार हमारा, कब तक हमें दबाओगे ।
थोथी सत्ता के बलबूते , कब तक हमें हटाओगे॥
जिस दिन मछुआ कमर बाँध कर, सड़कों पर आ जायेगा ।
सुनो सोनिया ! दस वर्षों का, महल वहीँ ढह जाएगा ॥ 
मनमोहन इल्जाम न रखना, फिर कोई मछुआरों पर  ।

मैं राहुल से बात करूंगा , दिल्ली के चौराहों पर ।
मछुआ घर निकल पड़ा हैं , चलने को अंगारों पर ॥

जिस सरकार में झूठ बोलकर, नेता काम चलाते हैं ।
जिस सरकार में पद पर बैठे, जिम्मेदार डराते है ॥
उस सरकार में हक की बोली, लगता है दब जायेगी ।
पक्षपात और राग द्वेष की, बात भला कब जायेगी ॥ 
कब तक सत्ता टिकी रहेगी, वादों के आधारों पर । 

मैं राहुल से बात करूंगा , दिल्ली के चौराहों पर ।
मछुआ घर से निकल पड़ा हैं, चलने को अंगारों पर ॥

जिन पर है दायित्व सदन का, वाहन चोर- उचक्के हैं । 
अधिकारी भी शपथ भूलकर, अपनी जात के पक्के हैं ॥
आवाजों की फ़ाइल बनाकर, ढेर लगायें  बैठे हैं ।
सचिवालय में जातिवाद का, फ़र्ज़ निभाये बैठे हैं ॥ 
सरकारी संरक्षण दिखता ,मुझको इन मक्कारों पर । 

मैं राहुल से बात करूंगा , दिल्ली के चौराहों पर ।
मछुआ घर से निकल पड़ा हैं, चलने को अंगारों पर ॥

प्रस्ताव ही नहीं , गंभीर पैरवी भी करे सपा

अब वक़्त आ गया है कि उत्तर प्रदेश में निवासरत मछुआ समुदाय की जातियों को अनुसूचित जातियों में सम्मिलित करने सम्बन्धी प्रस्ताव पर समाजवादी पार्टी केंद्र सरकार से मजबूत पैरवी भी करे।
उत्तर प्रदेश में सत्तासीन समाजवादी पार्टी की अबतक की कार्यशैली और रणनीति समाज के हिसाब से फायदेमंद रही हैं । सपा ने विधान सभा चुनाव 2012 में समाज से वादा किया था कि वह सत्ता प्राप्ति के पश्चात इन जातियों को अनुसूचित जातियों की परिधि में लाएगी और अनुसूचित जाति की सुविधा देते हुए इन जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल भी करेगी । हालाँकि संविधान अनुच्छेद 341 (1) के अंतर्गत यह शक्तियां केंद्र सरकार और संसद में निहित हैं और राज्य सरकार की भूमिका केवल परामर्श एवं संस्तुति सहित आवश्यक प्रस्ताव भेजने तक ही सीमित रहती है ।
गुजरे पूरे दोनों माह इन जातियों के लिए सर्वश्रष्ठ रहे । जहाँ फरवरी में सरकार ने विशाल रैली आयोजित करके इन जातियों के जज्बे को आँका जिस पर ये जातियां भारी पड़ीं और लखनऊ की सड़कों पर आन डटी वहीँ इनकी उमड़ी भारी तादाद से उत्साहित सरकार ने तुरंत केन्द्र सरकार को सिफारिशी पत्र  भेजते हुये शीघ्र ही कैबिनेट की संस्तुति को उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति /जनजाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान की 400 प्रष्टों की आख्या के साथ संलग्न कर प्रेषित किया । इतना ही नहीं पिछली बार के कटु अनुभव से चेतते हुए सपा सरकार ने इस दफा अपने रणनीतिकारों को प्रस्ताव के मूल्यांकन में लगाया और एक उत्कृष्ट प्रस्ताव तैयार कर केंद्र को कार्रवाही के लिए प्रेषित किया । शुकवार को विधान सभा सत्र के अंतिम दिन सदन में ध्वनि मत से संकल्प पास करके को केंद्र सरकार को भेजा। यहाँ तक तो सपा ने अपने काम को देर सवेर ही सही .....भली भांति सही सही  अंजाम दिया । अब सिर्फ केंद्र सरकार को गजट नोटिफिकेशन के माध्यम से सूचना प्रकाशित करनी हैं ।
लेकिन केंद्र की कांग्रेस सरकार इस प्रस्ताव को लेकर उतना उत्साह नहीं दिखा रही जितना प्रदेश सरकार और मछुआ जातियों ने दिखाया । कांग्रेस सरकार अल्पमत में है और सपा के समर्थन की बैशाखी पर टिकी है । अब सपा को चाहिए कि वह अपने 24 लोक सभा और 12 राज्यसभा सांसदों के माध्यम से कांग्रेस पर दवाब बनाये और इस प्रस्ताव को रद्दी की टोकरी में जाने से बचाए अन्यथा इस प्रस्ताव के लटक जाने और ठन्डे बस्ते में जाने पर कांग्रेस के साथ साथ सपा भी बराबर की दोषी प्रमाणित होगी । लेकिन हमें सिर्फ सपा के सहारे अपनी लड़ाई नहीं छोडनी होगी बल्कि अपना समर्थन सडक पर उतर कर दिखाना होगा । सारी पार्टियाँ हमारे पीछे खड़ी नज़र आएँगी ।
मेरी राय में सपा के सभी सांसदों को मछुआ समुदाय के लोग पत्र भेजें और बताएं उनकी लड़ाई अंतिम स्तर पर है । जहाँ पर सपा के एक एक सदस्य का समर्थन मायने रखता है । हालाकिं इस मुद्दे पर भाजपा का भी नीतिगत समर्थन है क्योकि उसके चुनावी एजेंडे में भी यह बिंदु था । बसपा से समर्थन की उम्मीद बेमानी है । महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे से जूझ रही कांग्रेस  यदि इस प्रस्ताव को मानकर मछुआ समुदाय को उसका बहुप्रतीक्षित अधिकार उपलब्ध करा देती है तो यूपी में मरणासन्न कांग्रेस को संजीवनी मिल सकती हैं । 

सोमवार, 11 मार्च 2013

आज कलुआ बहुत खुस है


अपने गाँव का कलुआ आज बहुत खुस है । डिजिटल जो हुई गवा ।
इंटर पास करते ही कलुआ बस लैपटाप की रट लगाए था । एक एक दिन भारी पड़ रहा था , लेकिन कलुआ ने उम्मीद न छोड़ी । कहता था नेताजी ने कहा है तो करके जरूर दिखायेंगे । आखिर वो दिन आ ही गया । कलुआ जैसे ही लैपटाप ले कर बस से उतरा, पूरा गाँव अड्डे पर उमड़ आया । लोगों ने कलुआ और लैपटाप को मालाओं से लाद दिया । हर कोई कलुआ की तारीफ़ करता चलता था । अपना कलुआ बड़ा होनहार है भाई । गाँव की शान है पठ्ठा । पूरे इलाके में यही तो है जो पहला लैपटाप जीत कर लाया है ।
आज सुबह से ही नहाधोकर कलुआ लैपटाप लिए शान से चौराहे पे बैठा है । जब से हाथ आया है , कलुआ तो एक दम पगला गया है । मारे ख़ुशी के रात भर सो न सका । रात भर में दो बार उठ कर लैपटाप चैक भी किया। सही तो रखा है न ।
 पूरा मोहल्ला कल से कलुआ के घर पड़ा हैं , गाँव के बुजुर्ग, औरतें और बच्चे घर से आगे जाते ही नहीं , बस एक नजर भर कर देखना चाहते हैं लैपटाप को । कलुआ किरकिट ट्राफी की तरह चमका रहा है लैपटाप को हर आधे घंटे में । गाँव में लाईट नहीं थी न , सो  कल ...लैप टाप चल न सका । रात भर भूकन हलवाई की दूकान में चार्ज किये रहा इन्वैटर से । थोडा बैटरी भरते ही गाँव में हल्ला मच गया .... अरे ! लैपटाप चल गया । लैपटाप चलते ही कलुआ के बाप का सीना चौड़ा हो गया । माँ दुआएं मांगती जाती थी कलुआ के लिए । डिस्प्ले पर नेताजी और मुख्यमंत्री जी की तस्वीर उभरते ही तालियाँ बज उठीं । हर कोई तारीफ़ कर रहा था । बुधई काका भी भीड़ में खड़े हैं ....हिसाब लगा रहे है अभी से । अगले साल मेरे भी घर में दो लैपटाप और दो टैबलेट होंगे ।
आज कलुआ के घर ढोलक बजेगी । सुबह से कलुआ की बहने बिरादरी में बुलावा बाँट आई है। पंसारी के यहाँ से 5 किलो बताशे मंगवाए गए हैं बाँटने के लिए ।
 इसी बहाने समाजवादी सरकार ने गाँव गाँव खुशियाँ बाँट दी । 

रविवार, 10 मार्च 2013

मैं क्यों मनाऊँ गणतंत्र ?

मैं क्यों मनाऊँ गणतंत्र ?
न तो हुयी मेरी गणना ,
किसी दौर में कभी ,
और न किसी तंत्र ने ,
समझा मुझे अपना हिस्सा ।
मैं क्यों गीत गाऊँ,
संविधान के ,
जो पल में ,
बदल दिया जाता है औरों के लिए ।
मैं और मेरे लोग ,
बदलाव की चिठ्ठी लिए,
दौड़ते रहे दफ्तर दफ्तर ,
फांकते रहे धूल संसदीय गलियारों की,
और बोलते रहे जिन्दाबाद,
उन बेजमीर मुर्दा लोगों की,
जिन्होंने गणतंत्र के नाम की ,
तोड़ी हैं बस रोटियाँ ही आज तक ।
मेरे हिस्से की धुप,
बना दी गयी जीनत ,
जिनके आँगन की ,
और मुझे पकड़ा दिए गए,
चंद लड्डू ,
बदले में ,
गणतन्त्र के नाम पर ।

सुन ले दिल्ली !!

सुन ले दिल्ली वक़्त हमारा आज नहीं कल आएगा
आरक्षण अधिकार हमारा , और नहीं टल पायेगा

सीमाए सब टूट रही है , बनी ज्वाल अब चिंगारी
जो अब भी वंचित हैं वो सत्ता के असली अधिकारी
साठ वर्ष से मछुआ केवल तेरी डोली ढोता है
छिले हुए काँधे को लेकर अपने मन में रोता है
टूटी नैय्या थका खिवैया भला किसे छल पायेगा

सुन ले दिल्ली वक़्त हमारा आज नहीं कल आएगा
आरक्षण अधिकार हमारा , और नहीं टल पायेगा

हमने तेरे लिए न जाने कितनी गलियां छानी हैं ।
एक ठन्डे झोके की खातिर तेरी शर्तें मानी हैं ।
देख रहा है आज जमाना सत्ता हमको देगी क्या ?
अब तेरे हाथों की ताक़त सब्र हमारा लेगी क्या ?
टालमटोल रवैया तेरा और नहीं चल पायेगा ।

सुन ले दिल्ली वक़्त हमारा आज नहीं कल आएगा
आरक्षण अधिकार हमारा , और नहीं टल पायेगा

द्रोण , तुम मरे नहीं,

द्रोण ,
तुम मरे नहीं,
आज भी जिन्दा हो ।
कुत्ते की तरह ,
जातिगंध सूंघते टाइटिल में,
आज भी कर रहे हो निषाद प्रतिभाओं का दमन ।
सत्ता के नजदीक रहने की चाह ,
निरंतर कटवा रही है तुमसे आज भी अंगूठे ।
गुरुओं का इतिहास कलंकित कर ,
आज भी गूंज रहा है तुम्हारा अठ्ठाहस ,
और तुम आज भी बने हुए हो सम्मानित ।
लेकिन भूल रहे हो तुम ,
बेइमान गुरु का पुत्र कभी पारंगत नहीं होता ,
अश्वत्थामा की तरह आज भी आवारा घूमता है ,
और कटवा कर छोड़ता है नाक ,
बदले में अंगूठे के ।

शनिवार, 2 मार्च 2013

आक्रोश

आप कहते हो कि बस ये जोश है ।
जी नहीं, ये बरसों का आक्रोश है ।।

बढ़ रही है हर तरफ बेचैनियाँ ।
और वो दिल्ली में बस मदहोश है ।।

बस पकड़नी थी, सो आँखें मूँद ली ।
वैसे उस घटना से मुझमें रोष है ।।

चीखती है उसकी आखों से व्यथा ।
ये अलग, वो तिश्ना लब खामोश है ।।

सिर्फ ठहराया गया मुजरिम उसे ।
जबकि व्यवस्था का सारा दोष है ।।

अजनबी सा रोज मिलता है मगर ।
वो कभी मेरा भी था, संतोष है ।।

तोमर शब्द की उत्पत्ति

तोमर शब्द की उत्पत्ति तोमा शब्द से हुयी है जिसका अभिप्राय एक पके हुए कद्दू से है । जो पकने के बाद पूरी तरह सूख जाता हैं । मछुआरे इसका डंठल तोड़कर इसके अन्दर का सूखा गूदा निकाल लेते थे और डंठल को उसी जगह वापस रखकर कोलतार से चिपका देते थे । अब यह तोमा एक बड़ी सी फ़ुटबाल का काम करता और पानी में उतराता । इस तोमे की सहायता से आसानी से तैरा भी जा सकता था । यह तोमा झील में डाल कर मछली शिकार हेतु खींचने वाली जाली की उपरी रस्सी से बाँधा जाता था ,जो जाल को पानी में डूबने नहीं देता था । इस प्रकार चालाक मछलियाँ , जो पानी की ऊपरी सतह से एक फिट ऊपर रहकर जाल के डूबने की वजह बच जाती थीं, इसी तोमे के कारण फंस जाती ।
 सीधे और सरल अर्थों में यह तोमा एक प्रकार का ब्लैडर होता था जिसे मछुआरों ने अपनी आवश्यकतानुसार ईजाद किया । इस तोमे को धारण करने वाले और इसका प्रयोग करने वाले मछुआरों ने कालांतर में स्वयं को तोमर लिखना शुरू कर दिया । इसका दोहरा फायदा होता । टाइटिल में जातिगंध सूंघकर पता लगाने वाला ठाकुर साहब या चौधरी जाट समझ कर सलाम ठोकता । समाज के उच्च शिक्षित मछुआ होकर भी मछुआ कहलवाने से बच जाते 
वहीँ दूसरी और तोमर एक अस्त्र का नाम भी है , जिसे चलाने में पारंगत क्षत्रिय राजपूतों ने भी स्वयं को तोमर लिखा ।
लेकिन मछुआ समुदाय के अर्थों में पहले वाली व्याख्या ही सटीक, स्पष्ट और संश्लेषित हैं ।

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

नदी बचेगी .....निषाद बचेगा


नदियों ने बड़ी बड़ी संस्कृतियों को जन्म दिया है । इसलिए विश्व की सभी महान सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुयी है । भारतीय संस्कृति में तीर्थ का बड़ा महत्त्व है और प्रायः सभी तीर्थ जल के बिना अधूरे हैं । अतः सभी प्रमुख तीर्थों की स्थापना नदियों के किनारे ही है या कम से कम किसी न किसी रूप में वहां जल की उपस्थिति अनिवार्य समझी गयी है, चाहे वह स्रोत रूप में हो अथवा ताल / सरोवर रूप में । भारतीय तीर्थ सदैव जल प्रधान रहे हैं।
      मछुआ संस्कृति का विकास भी नदियों के किनारे ही हुआ । सभी प्रमुख नदियों / पोखरों और सरोवरों के किनारे हमारी महान निषाद संस्कृति और परम्परा के भग्नावशेष बिखरे पड़े हैं । किन्तु आज हमारी महान सभ्यता और संस्कृति का सदाजयघोष करने वाली समस्त नदियाँ घोर जल प्रदूषण से पटी पड़ी है । जल प्रदूषण का सीधा सम्बन्ध जल श्रमिकों से होता है उनके धंधे रोजगार से होता हैं । जब हमारी भाग्य रेखा समझी जाने वाली पुण्य सलिलायें ही कुंठित होंगी ..प्रदूषित होंगी तो निषाद कहाँ से संपन्न होगा ? सदियों से लोगों के पाप बहाकर ले जाने वाली सदानीरा कलकलायें या तो अपनी गति को थाम कर सूख चुकी हैं या मात्र मानवीय एवं औद्योगिक अपशिष्टों की संवाहक भर होकर रह गयी है ।गरीबी ,बेकारी और कुपोषण से ग्रस्त नदी संस्कृति के मानने वाले और नितांत नदियों पर आधारित अपनी आजीविका को जल प्रदूषण के जरिये खो देने वालों का गुनाहगार कौन है ? बढ़ते जल प्रदूषण ने मछुआ जातियों को प्रतिष्ठित पारंपरिक धंधे छोड़ने को विवश किया है। औद्योगिककरण के नाम पर हजारों करोड़ डकारने वाली पूंजीपति और बदले में अपना अजैविक अपशिष्ट नदियों में प्रवाहित कर मछुआ समुदाय को निर्धन बनाकर नारकीय जीवन जीने को मजबूर करने वालों को ये हक किसने दिया ? पीड़ित निषादों के पुनर्वास की क्या व्यवस्था है ?
मैं घोषणा पूर्वक कह सकता हूँ कि आज भारत की किसी भी नदी का जल सीधे सीधे पीने योग्य नहीं हैं । मेरे गोकुल भ्रमण के दौरान मात्र 50 रूपये की मजदूरी के लिए दो मल्लाह एक दूसरे से लड़ने भिड़ने को तैयार हो गए। बात सिर्फ इतनी सी थी कि जिसका नंबर था मैंने उससे चलने की बात नहीं की । नाव तैरती थी लेकिन मेरा दिल डूबता उतराता था । दोपहर तीन बजे बोहनी (पहले ग्राहक से प्राप्त रूपये ) तक को तरसने वाला समाज , राष्ट्र की मुख्य धारा में कैसे आएगा ,ये कोई छोटा सवाल नहीं है भाई ।
       यमुना से उठती भयंकर सड़ांध युक्त दुर्गन्ध से सांस रुकी सी जाती थी , नौका में बैठना भी दूभर हुआ जाता था । जी हाँ ! ये वही यमुना थी जिसका पानी पीकर बड़े बड़े निषाद नेता आगे बढ़े । ये वही यमुना थी जिसकी तमाम यादें फूलन देवी से जुडी थी । ये वही यमुना थी जो निषाद दिग्गज जमुना प्रसाद की याद दिलाती थी । ये वही यमुना थी जो उत्तर भारत में सबसे पहले दिल्ली में मल्लाहों की जननी थी। ये वही यमुना थी जिसके बीहड़ में निषाद बागियों को संरक्षण मिला । ये वही यमुना थी जिसका इतिहास निषादों के साथ साथ चला । ये वही फलप्रदा यमुना थी कि जिसके उदगम तक मैं झाँक आया था । ये वही यमुना थी कि जिसका यमनोत्री में इतना मीठा और शीतल जल था कि मैंने इतना अच्छा जल जीवन में कभी नहीं पिया और किसी नदी का इतना निर्मल जल हो ही नहीं सकता।
क्या ये वही यमुना थी ?

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

कांग्रेस पुनः छेड़ सकती है रेणके आयोग का राग


सम्पूर्ण भारत में 193 ऐसी राष्ट्रभक्त जातियां रही हैं जिनमे मल्लाह ,केवट ,निषाद ,बिन्द ,धीवर ,डलेराकहार , रायसिख ,महातम ,बंजारा , बाजीगर ,सिकलीगर , नालबंध , सांसी, भेदकूट , छड़ा , भांतु , भाट , नट ,पाल ,गडरिया, बघेल ,लोहार , डोम ,बावरिया ,राबरी ,गंडीला , गाडियालोहार, जंगमजोगी ,नाथ,बंगाली,अहेरिया,बहेलिया नायक,सपेला,सपेरा, पारिधि ,सिंघिकाट ,कुचबन्ध,  गिहार अथवा कंजड आदि जो विमुक्त या घूमंतू जातियां कहलाती हैं और  Criminal Law Amendment Act 1871 के अनुसार अपराधी जातियां घोषित की गयी थीं । 1871 से लेकर 31 अगस्त 1952 तक ये जातियां अंग्रेजों के बनाये इसी काले कानून का शिकार रहीं और जरायम पेशा का नाम लिए बदनामी की जिन्दगी जीती रहीं । इन जातियों को दूसरे  गावों या शहरों में बसने की इजाजत नहीं थी , अपनी मर्जी का धंधा करने की अनुमति नहीं थी और तो और न्यायालय में भी इन जातियों की सुनवाई नहीं थी । आजाद भारत भी यह जातियां 5 वर्ष 16 दिन भारत वासियों की गुलाम बनी रहीं और
31 अगस्त 1952 को एक सरकारी आदेश के तहत आजाद हुयीं । उस दिन से इन जातियों को विमुक्त जातियों की संज्ञा दी गयी । 81 वर्ष की सरकारी गुलामी और सैकड़ों वर्षों की सामाजिक गुलामी के चलते ये जातियां शैक्षणिक , सामाजिक , आर्थिक, राजनैतिक और धार्मिक रूप से पिछड़ गयीं और आज भी दुनिया की तरक्की से दूर यह जातियां दूसरी जातियों से 64 साल पीछे हैं ।  इन जातियों की आबादी 15 करोड़ से भी अधिक है लेकिन इन जातियों का देश की विधायिका , न्यायपालिका और कार्यपालिका में कोई समुचित प्रतिनिधित्व नहीं है , थोडा बहुत जो है भी , तो वो न के बराबर है । आज भी इन जातियों के लोग अशिक्षित ,बेरोजगार, बेकार, बेजार ,बेघर और बेइज्जत हैं और खानाबदोश जिन्दगी जीने को अभिशप्त हैं । इस समाज की तरक्की और खुश हाली के लिए केंद्र सरकार ने 2006 में एक कमीशन बनाया जो रेणके आयोग के नाम से जाना जाता है । इसे राष्ट्रीय विमुक्त/ घूमंतू /अर्ध घूमंतू जनजाति आयोग भी कहा जाता है जिसके अध्यक्ष /चैयरमैन श्री बाल कृष्ण रेणके हैं । इस कमीशन ने केंद्र सरकार को 2008 में अपनी सिफारिशें सौंपी । अत्यंत खेदजनक है कि 5 वर्ष बीतने के बाद भी इस केंद्र की कांग्रेस सरकार रेणके कमीशन की सिफारिशें लागू नहीं कर पाई । 
वास्तव में इस कमीशन की आड़ में केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भेजे गए 2005  में 17 जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल करने के प्रस्ताव को ठन्डे वस्ते में डालने का कार्य किया। और ये सन्देश देने का कुप्रयास किया कि सिर्फ 17 नहीं बल्कि 193 जातियों का व्यापक हित सोचा जा रहा है , चूंकि ये जातियां बहुत कम संख्यां में हैं, नेतृत्व शून्यप्राय हैं और बिखरी हुयी हैं अतः इन्हें राजनैतिक रूप से एकत्र कर पाना असंभव कार्य है । इस प्रकार प्रस्तावों और आयोगों के ढेर पर बैठ कर राजनीति करने वाली कांग्रेस ने इन जातियां का बहुत बड़ा अहित किया है ।
अब फिर 17 जातियों का उत्तर प्रदेश सरकार का प्रस्ताव केंद्र सरकार पर पहुँच गया है । बहुत संभव है कि इसे पुनः दबाने के लिए मक्कारी और अय्यारी की खाल ओढे केंद्र में बैठी कांग्रेस फिर से रेणके आयोग का शगूफा छोड़ दे । 

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

पहले संघ बनाओ फिर ख्वाब देखो !

हम चाहते तो सब कुछ हैं , लेकिन अपने फटे हुये नेकर पर भी गौर नहीं करना चाहते । हमारे युवा क्रांति की बात करते है लेकिन सैकड़ों जातियों और उपजातियों में बिखरे मछुआ समाज को एक जुट रखने पर मौन हो जाते है । मोदी के नाम पर सब एक होने तैयार हैं लेकिन आरक्षण के नाम पर अपने निषाद ही बंटे हुए हैं । हमारे बुजुर्ग जाति और उपजातियां तोड़कर व्याह /शादी सम्बन्ध बनाने की बात करते करते करते बूढ़े हो गए लेकिन इस संभव कार्य को अंजाम नहीं दे पाए । हमारे नौजवान जाति बताने की शर्म के चलते अपने अधिकारों से ही मुंह चुराते नजर आये कि कहीं फर्जी राजपूती शान की कलई न खुल जाए ।
हमारे नेता पार्टियों के प्रवक्ता भर होकर रह गए । पार्टी लाइन से हटकर कहने तक की हिमाकत नहीं जुटा पाए । समाज का विरोध सरकारों में होता रहा और नेतागण पार्टी की नीतियों का बखान करते रहे । समाज की राजनीति नेताओं का निजी स्वार्थ पूरा करने का जरिया बन गयी ।
हमारे लोग अधिकार तो चाहते हैं , लेकिन घर बैठ कर । चारपाई में लेटे लेटे ...रजाई ओढ़कर हक चाहता है मछुआ समाज । मुझे तो लगता है ये समाज सड़कों पे उतरने से डरता है, घबराता है , भय खाता है । कहीं मुकदमा दर्ज न हो जाए । एक चमार ने मुझसे कहा था "तुम्हारे लोग कुछ नहीं कर पाए , बस दारू पीते रहे और तुम्हारी औरतें काम करती रही " । मैं चाहते हुए भी प्रतिरोध न कर सका , उसका जातीय विकास अहम् बनकर बरस रहा था ।
स्वाभिमान किसी पाठशाला में नहीं सिखाया जाता । यह एक संस्कार है , चाह है , जीवन क्रम है । स्वाभिमानी व्यक्ति आंच आने पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देता है और तो और कमजोर से कमजोर व्यक्ति भी प्रतिकूल बात पर पलट कर जवाब जरूर देता है । लेकिन जो समाज झूठन खाकर बड़ा हुआ हो उससे बदला, विरोध और विद्रोह की आशा करना व्यर्थ ही है । लिखना तो नहीं चाहता लेकिन मजबूर हूँ ...अपनी बात के समर्थन में तथ्य तो देना ही पड़ेगा ....शहरी क्षेत्रों में सवर्णों के झूठे बर्तन माँज कर बड़ा हुआ यह समाज उल्टा हमारे मुंह तो लग सकता है , हमारा विरोध तो कर सकता हैं लेकिन किसी और का सामना करने का  इसमें नहीं । हम साठ बरसों में अपने ही लोगों से पराजित हुए हैं । टोकने पर मुंह जोर लोग कहते हैं .....हम तो वो चीज खाते हैं जो तुम भी क्या खाओगे । हमारे रात के खाने में चार सब्जी , हलवा ,पूड़ी , लम्बे लम्बे बांसमती के चावल होते हैं , सलाद के साथ । हमारे घर में पाँच पांच घरों का बचा हुआ खाना आता है । पत्नी से सवर्णों की झूठन घर लाकर स्वाद और लज्जत के साथ खाने वाला समाज विरोध आवाज कैसे उठाएगा ? जिसकी समाज में पत्नी घरों में काम करेगी उस समाज से शराब और जुआ छुडाना ....विरोध के लिए तैयार करना ....नामुमकिन सा लगता है ।

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

नया नेतृत्व कैसे मिले ?

समाज के नेतृत्व के सवाल पर सब चुप हो जाते है ,

युवा कहता है - मैं बेरोजगार हूँ , मुझे कैरियर बनाना है , पढ़ना है , समाज के विषय में और लोग सोंचे ।
सरकारी नौकरी वाला कहता है - मैं सर्विस रूल से बँधा हूँ , खुलकर सामने नहीं आ सकता । मुझे जाने दो ।
प्राइवेट नौकरी वाला कहता है - पूरा समय नौकरी में ही निकल जाता है , समाज के लिए कहाँ से समय निकालूं ।
दुकानदार कहता है - दूकान बंद करके जाऊँगा तो धंधा चौपट हो जायेगा ।
व्यापारी कहता है - रुपया दे सकता हूँ लेकिन समय नहीं । 100 रुपया देगा और 500 लोगों से कहेगा कि मैंने चन्दा दिया है ।
रिटायर्ड अधिकारी कर्मचारी कहता है - शुगर का मरीज हूँ ,हर आधे घंटे में पेशाब करना पड़ता है , हार्ट का मरीज हूँ दौड़ भाग नहीं कर सकता । घर बैठे राय दे सकता हूँ , पैसा तो अब रहा ही नहीं ।
किसान और मजदूर अशिक्षित और कम संसाधनों की वजह से मजबूर हो जाते हैं ।
ऐसे में समाज को नया नेतृत्व कैसे मिले ?
या ऐसे में उसी बैरी पिया पर फिर दिल न लाया जाए तो क्या किया जाए ?

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

अरे भाई ! हमें भी जानकारी है मगर ....

प्रायः अधिकारी लोग मछुआ जातियों के बुद्धिजीवियों को बुद्धूजीवी समझते है और आरक्षण के मुआमले में हमारे लोगों को कानून पढा कर खामोश कर देना चाहते है । सत्ता के गलियारों में बैठे फाइलों का ढेर लगाए बैठे वे अधिकारी जो SC आरक्षण की बदौलत ही उच्च पदों पर आसीन है ...रोड़े अटकाते आये हैं । वे हर बार भूल जाते हैं कि 62 साल से वे जिस आरक्षण की रोटी तोड़ रहे हैं उस पर मछुआ समुदाय का भी उनके समान अधिकार है । हमें बेवकूफ़ समझने वाले जान लें .....हमने E J Kitts को पढ़ा है , हमने J N Bhattacharya को पढ़ा है , हमने M A Sheering को पढ़ा है । हमने H A Rose को पढ़ा है , हमने Blunt को समझा है , हमने  E T Atkinson को जाना है । हमने Denzil Ibbetson को पढ़ा है, हमने E D Maclagan को पढ़ा है, हमने H C Conybeare को पढ़ा है , हमने C H Brone को पढ़ा है, हमने H R Nevill को पढ़ा है, हमने W Crook को रट रखा है । हमने Risley को पढ़ा है ,हमने G S Ghurye को पढ़ा है । हमने R V Russel & Heera Lal को पढ़ा है ,हमने W C Abel को पढ़ा है इतना ही नहीं हमने A C Turner को भी खोज निकाला है।
हमने छेदी लाल साथी को संस्तुतियों सहित पढ़ा है , हमें डॉ बाबा साहब अंबेडकर के सम्पूर्ण वांग्मय को भी  पढ़ा है । इतना ही नहीं हमने 1891, 1901 , 1911, 1931 , 1951, 1961 ,1971, 1981 ,1991, 2001 की जनगणना रिपोर्टों को भी ध्यान से पढ़ा है ।
हमें भैया राम मुंडा बनाम अनिरुद्ध पटार 1971 , नारायण बेहरा बनाम उडीसा राज्य 1978 , शिवपूजन प्रसाद बनाम उ0प्र0 सरकार 1980 सहित राधेश्याम बनाम दिल्ली सरकार जैसे ऐतिहासिक नजीर बने सर्वोच्च / उच्च न्यायालयों के निर्णयों की भी अच्छी जानकारी है । इतने नाम 62 साल से आरक्षण की रोटी तोड़ रहा कोई SC अधिकारी गिना नहीं पायेगा .....अजी ! गिनाना तो दूर ...उसने नाम सुने तक नहीं होंगे । फिर हमारी फ़ाइल को आपत्तियां लगाकर रोकना और हमारे समाज को 62 सालों से संवैधानिक अधिकारों से वंचित करते रहना क्या देशदोह नहीं ? क्या ये मानवता के विरुद्ध षड्यंत्र नहीं ? क्या ये भद्दा मजाक नहीं ? क्या ये जिन्दा भाई भतीजा वाद नहीं ? क्या ये पद का दुरूपयोग नहीं ?
हमारे पास 1879 से लेकर 2012 तक के दस्तावेज मौजूद हैं क्योकि हमारे यहाँ दुनिया सबसे नायाब खजाना विश्व प्रसिद्द रजा लाइब्रेरी हैं । लेकिन इतना सब होने के बावजूद हम कमजोर है । कारण ........ हमारे लोग सोये हैं , संगठित नहीं हैं , अधिकारों की आवश्यकता को आज भी जान नहीं पा रहे है । अशिक्षा ,अन्धविश्वास और नशे के जाल में फंसे है । जो पढ़ लिख गए वे समाज के प्रति अपने दायित्वों को तिलांजलि दे चुके हैं ।

समय करवट ले रहा है .....2013/ 2014 का लोकसभा चुनाव दस्तक दे रहा है ...यदि मछुआ समुदाय ने अतीत से सबक सीखा और राजनैतिक शक्ति को संचित कर लिया तो चुनाव पूर्व ही सत्ता में बैठी लालची पार्टियाँ आपके आगे झुक जायेगी ।